सिर पर जोरदार मार लगी थी। लड़का चीख चीख के मां-बहन की गालिंयां दे रहा था। लड़की दुपट्टे से उसके सिर का खून पोछ रही थी। आसपास खड़े लोग तमाशबीन थे। लड़की रोजाना इसी रास्ते से काॅलेज आया जाया करती थी। लड़का इसी सड़क किनारे अपनी पेंटिंग की छोटी सी दुनिया लेकर बैठता था। पेंटिंग की दुकान से महज चार कदम की दूरी पर चायवाले की सिकुड़ी सी दुकान थी। काॅलेज जाने के दौरान जब भी लड़की चाय पीने यहां आती, तो दोनों के बीच आंखों ही आंखों में कुछ गुफ्तगू होती थी। लड़के को अब तक लड़की से सीधे संपर्क साधने का मौका नही मिला था। लेकिन आज जब लड़की चाय पी रही थी, तब एक चोर आया और लड़की का बैग लेकर भागने लगा। लड़की ने जैसे ही शोर मचाया, सबसे पहले अपनी पेंटिंग की दुकान से लड़का चोर के पीछे भागा। लड़के ने चोर को पकड़ा और चोर ने उसपर हमला बोल दिया। लड़के को सिर पर मार लगी पर वो लड़की का पर्स बचाने में कामयाब रहा। मानो आज वो शाहरुख खान बन गया था। लड़का जब पर्स लेकर लौटा, तब लड़की ने अपने दुपट्टे से उसका माथा साफ किया और लड़के का हाल ए मिजाज पूछा। लड़के ने लड़की से कहा कि वो ठीक और वो तब और ज्यादा ठीक होगा। जब लड़की उसके साथ एक कप चाय पीयेगी। कुछ देर बाद दोनों उसी सिकुड़ी चाय की दुकान में चाय की चुस्कियां लेते नजर आये !
!!! फितूर !!!
About Me
- Shivangi Thakur
- नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।
Sunday, 18 September 2016
लघुकथा : सफरनामा
सिर पर जोरदार मार लगी थी। लड़का चीख चीख के मां-बहन की गालिंयां दे रहा था। लड़की दुपट्टे से उसके सिर का खून पोछ रही थी। आसपास खड़े लोग तमाशबीन थे। लड़की रोजाना इसी रास्ते से काॅलेज आया जाया करती थी। लड़का इसी सड़क किनारे अपनी पेंटिंग की छोटी सी दुनिया लेकर बैठता था। पेंटिंग की दुकान से महज चार कदम की दूरी पर चायवाले की सिकुड़ी सी दुकान थी। काॅलेज जाने के दौरान जब भी लड़की चाय पीने यहां आती, तो दोनों के बीच आंखों ही आंखों में कुछ गुफ्तगू होती थी। लड़के को अब तक लड़की से सीधे संपर्क साधने का मौका नही मिला था। लेकिन आज जब लड़की चाय पी रही थी, तब एक चोर आया और लड़की का बैग लेकर भागने लगा। लड़की ने जैसे ही शोर मचाया, सबसे पहले अपनी पेंटिंग की दुकान से लड़का चोर के पीछे भागा। लड़के ने चोर को पकड़ा और चोर ने उसपर हमला बोल दिया। लड़के को सिर पर मार लगी पर वो लड़की का पर्स बचाने में कामयाब रहा। मानो आज वो शाहरुख खान बन गया था। लड़का जब पर्स लेकर लौटा, तब लड़की ने अपने दुपट्टे से उसका माथा साफ किया और लड़के का हाल ए मिजाज पूछा। लड़के ने लड़की से कहा कि वो ठीक और वो तब और ज्यादा ठीक होगा। जब लड़की उसके साथ एक कप चाय पीयेगी। कुछ देर बाद दोनों उसी सिकुड़ी चाय की दुकान में चाय की चुस्कियां लेते नजर आये !
Saturday, 20 August 2016
सैलाब
नीरा बेदम सीधे सड़क पर चली जा रही थी। उसका शरीर पूरी तरह सुन्न पड़ गया था। स्कार्फ को कफ़न की तरह लपेटे वो बदहवास कुछ ढूंढ रही थी। हर दस कदम पर वो रुक रुक कर एक एक लाश को तलाशती। जिस रास्ते वो चल रही थी, उसके दोनों ओर लाशो का ढेर लगा हुआ था। जब भी वो किसी लाश को हाथ लगाती, तो उसे लगता कि कोई उसके दिल पर खंजर चला रहा है। उसके आंसू कुछ इस कदर बह रहे थे कि मानो आज के बाद उसके आँखों में फिर ये कभी वापस ही नहीं आएंगे। उसने कभी नहीं सोचा था कि जिस जगह वो अपने ज़िन्दगी के सबसे हसीन पल गुजारने आयी है, वही जगह उसे उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा दर्द देगा। लोग नीरा को कहते थे कि शादी और सगाई के बीच का पल लड़का और लड़की के लिए बेहद खास होता है। इन पलो को यूँ जीना चाहिए कि फिर ये पल ज़िन्दगी में लौट कर ही नही आएंगे। नीरा ने भी इन बेहतरीन पलों को यादगार बनाने की ठानी और जिद करके अभिनव से उत्तराखंड चलने को कहा था। अभिनव नीरा की बात कभी नहीं टालता था। अरेंज मैरिज होने के बावजूद भी वो नीरा को किसी बेइंतेहा चाहनेवाले आशिक़ जैसा प्यार करता था। उतराखंड में तो अभी दो ही दिन बीते थे नीरा और अभिनव के। रोजाना ये दोनों यहाँ गंगोत्री जैसा गहरा प्यार और यमुनोत्री जैसी यादें बुन रहे थे। लेकिन अचानक आसमान और जमीन दोनों ने मिलकर ऐसा कहर बरपा की, नीरा अब अकेली है और उसे तो ये भी नहीं पता कि जिसके लिए वो इन आंसूओ को बहा रही है वो इंसान जिंदा भी है या नहीं। नीरा यही सब सोचते हुये फिर अपने कदम आगे बढाती उस दौर से गुजर रही थी जहाँ ना तो मौत का जिक्र था और नाही अभिनव के जिन्दा होने की कोई गुंजाईश। थक हारकर वो पास ही के एनडीआरएफ कैम्प में जा बैठी। उसने भी सोच लिया था कि या तो वो यहाँ से अभिनव को साथ लेकर लौटेगी या फिर वो खुद भी बग्याल की पहाड़ी से छलांग लगा लेगी। एनडीआरएफ कैम्प में बैठे बैठे ही वो अपनी सगाई की अंगूठी को बार बार देखती और फिर टूट जाती। नीरा अपनी ही पशोपेश में थी कि इतने में ही एनडीआरएफ के कैम्प में लगे स्पीकर में वायरलेस से एक आवाज़ आयी, "एनडीआरएफ टीम....एनडीआरएफ टीम ! वी हैव फाउंड अ मैन हू इज अलाइव ! ही हैज अ टैटू ऑन हिज हैण्ड इन्सस्क्राइब्ड विद नीरा.....ओवर एन्ड आउट !" ये शब्द सुनते ही नीरा के बेजान और सुन्न पड़े शरीर में जान आ गई और इस छोटे से अनाउंसमेंट ने नीरा की ज़िन्दगी में बड़ा सा बदलाव ला दिया।
Friday, 15 July 2016
कभी सोचा है???
पता है जब कभी खबर सुनती हूँ कि दुनिया के किसी अन्य कोने में कोई आतंकवादी हमला हुआ है, तब मैं सच में सहम जाती हूँ। वैसे तो एक पत्रकार होने के नाते मुझे डरने और घबराने का कोई हक़ नहीं, लेकिन पत्रकार होने के साथ साथ मैं एक इंसान भी हूँ और सहम इसलिए जाती हूँ क्यूंकि मुझे मरनेवालों से ज्यादा उस आतंकवादी का ख्याल आता है, जो दूसरों की ज़िन्दगी के साथ साथ अपनी ज़िन्दगी भी तबाह कर देता है। कभी कभी बड़ी गहराई से सोचती हूँ कि आखिर क्यूँ कोई 24-25 वर्षीय नौजवान अचानक आतंकवादी बन जाता है। आखिर उसकी ऐसी क्या मज़बूरी रही होगी कि हाथ में बंदूक और सिर पर कफ़न बांधे ये मौत को हंसी ख़ुशी गले लगा लेता है !
पहले तो ऐसा लगता था कि लोगो में शिक्षा का अभाव है और इसी कारणवश ये लोग आतंक की राह पर चल पड़ते है। लेकिन अब.....! अब तो पढ़े-लिखे, अच्छे घरों के, अच्छी डिग्री के साथ, अच्छा पैसा कमाने वाले नौजवान भी इस राह को अपनाने लगे है। आतंकवादी बनने लगे है। आतंकवादी हमले के बाद क्या होता है, ये हम सब जानते है। लेकिन इस हमले से पहले आखिर किस तरह की तैयारी की जाती होगी? कैसे एक लड़का, जिसका एक परिवार होगा। कुछ दोस्त होंगे। गलफ्रेंड होगी। एक अच्छी नौकरी होगी। निश्चित दिनचर्या होगी। ज़िन्दगी जीने के पीछे एक मकसद होगा। अचानक से उसके लिए सारी परिभाषाएँ बदल जाती है। उसके लिए जीवन का मकसद ही बदल जाता है।
सोचिये जरा....! जब स्कूल में उस आतंकवादी को जिस टीचर ने पढ़ाया होगा, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिसे वो ज्ञान और जीवन में आगे बढ़ने की कला सिखा रही है वो एक दिन बड़ा होकर इसी ज्ञान के सहारे जीवन जीने की कला नहीं सीखेगा बल्कि कइयों की जीवन लीला समाप्त कर देगा। उस टीचर ने कभी ये उम्मीद की होगी कि बड़ा होकर उसका छात्र एक काबिल नौजवान बनेगा और कुछ करें ना करे, कम से कम अपना और अपने परिवार का पेट तो जरूर पाल लेगा।
आतंकवादी बनने से पहले जिस गली- मोहल्ले में वो रहता होगा। जहां के बच्चे उस नौजवान में अपना भविष्य देखते होंगे, सोचिये क्या बीतती होगी उन बच्चों पर, जब उनके आईडियल फलां फलां भैया अचानक टीवी पर दिखने लगे और वो भी हाथ में बड़ी बड़ी बन्दूको के साथ। टीवी पर एंकर चीख चीख कर उसे आतंकवादी बता रहा हो। फिर तो मोहल्ले के उस बच्चे को अपने आसपास बड़े हो रहे हर नौजवान में अपना आईडियल नहीं बल्कि एक आतंकवादी नज़र आता होगा।
मुझे नही पता क्यूँ और कैसे कोई आतंकवादी बन जाता है। लेकिन मुझे इतना जरूर पता है कि पहले मज़बूरी में और अब जानबूझकर नौजवान इस अंतहीन गली का रुख कर रहे है। ये आतंकवाद ना जाने कब खत्म होगा? ना जाने कब एक इंसान दूसरे इंसान की जान लेना बंद करेगा। ना जाने कब तक जाति और धर्म के नाम पर आये दिन कत्ले-आम होता रहेगा। इसी के साथ एक गौर करने वाली बात ये भी कि क्या 'आतंकवादी' किसी और दुनिया से आते है?? ध्यान से सोचिये और अपने अंतर्मन से पूछिए, इस सवाल का जवाब आपको स्वयं आपके भीतर मिल जाएगा। फिलहाल आज के लिए इस फितूरी मन से बस इतना ही।
पहले तो ऐसा लगता था कि लोगो में शिक्षा का अभाव है और इसी कारणवश ये लोग आतंक की राह पर चल पड़ते है। लेकिन अब.....! अब तो पढ़े-लिखे, अच्छे घरों के, अच्छी डिग्री के साथ, अच्छा पैसा कमाने वाले नौजवान भी इस राह को अपनाने लगे है। आतंकवादी बनने लगे है। आतंकवादी हमले के बाद क्या होता है, ये हम सब जानते है। लेकिन इस हमले से पहले आखिर किस तरह की तैयारी की जाती होगी? कैसे एक लड़का, जिसका एक परिवार होगा। कुछ दोस्त होंगे। गलफ्रेंड होगी। एक अच्छी नौकरी होगी। निश्चित दिनचर्या होगी। ज़िन्दगी जीने के पीछे एक मकसद होगा। अचानक से उसके लिए सारी परिभाषाएँ बदल जाती है। उसके लिए जीवन का मकसद ही बदल जाता है।
सोचिये जरा....! जब स्कूल में उस आतंकवादी को जिस टीचर ने पढ़ाया होगा, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिसे वो ज्ञान और जीवन में आगे बढ़ने की कला सिखा रही है वो एक दिन बड़ा होकर इसी ज्ञान के सहारे जीवन जीने की कला नहीं सीखेगा बल्कि कइयों की जीवन लीला समाप्त कर देगा। उस टीचर ने कभी ये उम्मीद की होगी कि बड़ा होकर उसका छात्र एक काबिल नौजवान बनेगा और कुछ करें ना करे, कम से कम अपना और अपने परिवार का पेट तो जरूर पाल लेगा।
आतंकवादी बनने से पहले जिस गली- मोहल्ले में वो रहता होगा। जहां के बच्चे उस नौजवान में अपना भविष्य देखते होंगे, सोचिये क्या बीतती होगी उन बच्चों पर, जब उनके आईडियल फलां फलां भैया अचानक टीवी पर दिखने लगे और वो भी हाथ में बड़ी बड़ी बन्दूको के साथ। टीवी पर एंकर चीख चीख कर उसे आतंकवादी बता रहा हो। फिर तो मोहल्ले के उस बच्चे को अपने आसपास बड़े हो रहे हर नौजवान में अपना आईडियल नहीं बल्कि एक आतंकवादी नज़र आता होगा।
मुझे नही पता क्यूँ और कैसे कोई आतंकवादी बन जाता है। लेकिन मुझे इतना जरूर पता है कि पहले मज़बूरी में और अब जानबूझकर नौजवान इस अंतहीन गली का रुख कर रहे है। ये आतंकवाद ना जाने कब खत्म होगा? ना जाने कब एक इंसान दूसरे इंसान की जान लेना बंद करेगा। ना जाने कब तक जाति और धर्म के नाम पर आये दिन कत्ले-आम होता रहेगा। इसी के साथ एक गौर करने वाली बात ये भी कि क्या 'आतंकवादी' किसी और दुनिया से आते है?? ध्यान से सोचिये और अपने अंतर्मन से पूछिए, इस सवाल का जवाब आपको स्वयं आपके भीतर मिल जाएगा। फिलहाल आज के लिए इस फितूरी मन से बस इतना ही।
Wednesday, 25 May 2016
लघुकथा :- दी एंड
लड़की ने बहुत दिनों बाद आज काम से थोड़ी फुर्सत ली थी | जिंदगी इतनी व्यस्त थी कि उसे किसी चीज का अहसास ही ना था कि आखिर दुनिया में चल क्या रहा है | उसने अपनी सहेली को फोन कर मिलने बुलाया | दोनों घंटे भर कॅाफी टेबल पर बैठे एक दूसरे को निहारते रहे | लड़की की सहेली से रहा ना गया और वो बोली,"तू कब तक ऐसी मनहूसियत भरी शक्ल लेकर घूमेगी ! देख अपनी हालत ! ऐसी तो तू ना थी ! हो क्या गया है तूझे ! तू ही कहती थी ना कि जो हमारी कद्र नहीं करता, उनके बारे में हमें नहीं सोचना चाहिए ! फिर क्यों? तू भूल क्यों नहीं जाती उसे? सुन, तू एक काम कर उसे एक बार कॅाल कर ! अरे पूछ तो ले कमबख्त से कि आखिर हुआ क्या? क्या पता उसकी शादी टूट गई हो ! क्या पता उनकी ना जमी हो ! कम से कम पूछ तो ले यार !" लड़की ने सहेली की बात मानी और दिल पर पत्थर रखकर लड़के को कॅाल लगाया | लड़के ने लड़की का कॅाल ब्लॅाक कर रखा था | अब लड़की के भीतर फिर वही ज्वालामुखी फूट पड़ा | अपनी सहेली से तमतमाकर बोली, "तू ठीक कहती है जो हमारी इज्जत ना करें, उनके बारे में हमें भी नहीं सोचना चाहिए ! बस अब बहुत हुआ ! आज तेरी कसम खा कर कहती हूं, ये मनहूसियत यही इसी कॅाफी टेबल पर छोड़ कर जा रही हूं ! आज के बाद नो मोर मनहूसियत....फाइनली दी एंड......!!!!"
लघुकथा :- चुंबक
लड़की का दिल चुंबक सा लड़के की ओर खींचा चला जा रहा था | लड़की ने अपने दिल को पतंग की उस डोर जैसे थाम रखा, जिसके छुटते ही जिंदगी की डोर किसी और के हाथ में चली जाती है | लड़की दिल को खूब समझाती कि लड़का उसका हो नहीं सकता | लेकिन दिल ने तो जैसे ठान ही लिया था कि वो या तो दो दिलों को मिलवा देगा या फिर द ग्रेट वाॅल आॅफ चाइना जैसी दीवार खड़ी कर देगा | लड़की ने बेजोड़ कोशिश कि लेकिन ये दिल की पतंंग उसके बस में नहीं थी और एक दिन उसके हाथ से छूट ही गई | लड़की कबूल कर बैठी कि उसे मोहब्बत है | पर लड़की के दिल की पतंग कटकर गलत छत पर जा गिरी थी | लड़के के दिल में लड़की के लिए कुछ न था | लड़की को जब तक इस बात का आभास होता तब तक बहुत देर हो चुकी थी | अब तक तो लड़की ने कबूलनामा भी पढ लिया था और अपनी जिंदगी की हर पतंग की डोर लड़के के नाम कर आसमान में लहरा रही थी | लड़के की समझ में नही आ रहा था कि वो इस पगली को कैसे समझाये कि ये पतंगबाजी नहीं जिंदगी का खेल और ऐसे ही किसी को अपनी डोर नहीं थमाई जाती | लड़के ने लड़की को समझाने की लाख कोशिश की, लेकिन इसी चक्कर में उसकी भी पतंग कट गई | लड़की ने आखिरकार यहां भी बाजी मार ली | लड़की को समझाने के चक्कर में लड़के की कन्नी कट गई और फिर लड़की ने ऐसा मांजा लपेटा कि आज लड़का-लड़की दो बच्चों की गृहस्थी के साथ माता-पिता में तब्दील हो गए है |
लघुकथा :- नीला आसमान
छत पर कंबल की ओट में गर्दन से पैर तक छिपा सोनू नीले आसमान की तरफ एकटक तांक रहा था | आज चांद अपने साथ सितारों की ऐसी बहार लाया था कि जान पड़ता था आसमान में किसी की शादी हो रही हो | सोनू अब तक कई बार लगभग सारे तारे गिन चुका था, लेकिन हर बार उसे ऐसा लगता था कि एकाध तारा छूट गया है | ये सिलसिला जारी ही था कि इतने में अम्मा छत पर आई और पूछा, 'क्या हुआ बेटा, कहां खोये हो? देख रही हूं बड़ी देर से आसमान में तांकाझांकी कर रहे हो ! बात क्या है?' सोनू ने मां का आंचल थामा और जगह बनाकर लेट गया | मां की मंद मुस्कान को निहारते हुए बोला, 'अरे मेरी मां, मैं तो बस आज ये उपर जमी महफिल देख रहा हूं ! देखो तो कैसे तारों की भीड़ लगी है ! सब तारे आज नहाकर आये है लगता है, तभी तो ऐसे चमक रहे है ! अच्छा मां बताओ ना इनसे से बाबा कौनसे है?' एक पल को तो सोनू की मां शून्यमुद्रा में चली गई | फिर जल्दी से अपने दिल को संभाला और बोली, 'लो भला ये भी कोई पूछने कि बात है ! जो सबसे सुंदर और चमकीला है वही तो तुम्हारे बाबा है ! हमेशा की तरह सबसे पाक, सबसे साफ ! सबसे अलग, सबसे अनोखे !' मां की बातें सुन सोनू झटके से उठ गया और बोला, 'अरे मां, फिर तो बाबा वो बड़े वाले चांद है ! देखो तो कैसे वहां भी अपनी हूकूमत चला रहे है ! जैसे यहां चलाते थे !' सोनू के शब्द सुनकर मां भावविभोर हो उठी और सोनू बाबा की पहचान वाले चांद को पाकर रोमांचित !
लघुकथा :- सुनहरा सपना
आज लड़का पहली सैलरी के बाद घर लौट रहा था।एक तो उसे घर आने की जल्दी थी, उपर से टिकट की मुसीबत। लड़के ने ट्रेन के जनरल डिब्बे में ही सफर करना उचित समझा। लड़के ने लड़की को इतल्ला कर दिया था कि वो आज शाम तक पहुंच जायेगा। लड़की ने भी कल सुबह मिलने की बात कही और कहा कि कल ही बात करते है। लड़के को लड़की का ये बिहेवियर थोड़ा अजीब लगा। खैर उसने लंबी सांस ली और अपनी सीट पकडकऱ बैठ गया। उसके बाद लड़के के मोबाइल का नेटवर्क पुरानी गर्लफ्रेंड की तरह आने जाने लगा, लड़की से संपर्क साधना मुश्किल था। देखते ही देखते लड़के की आंख लग गई और उसने बड़ा ही सुनहरा सपना देखा। लेकिन एक सहयात्री के धक्के ने लड़के के सपने को क्षणभंगुर कर दिया और उसे हकीकत से रूबरु कराया। चार घंटे की यात्रा के बाद आखिरकार लड़का अपने शहर पहुंच ही गया। जैसे ही वो ट्रेन से उतरा, किसी ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ मारा। लड़का तैश में आकर पीछे मुड़कर मारने ही वाला था कि वो एक ही पल में शेर से भीगी बिल्ली बन बैठा। जैसे उसे गहरा सदमा लगा हो। लड़की ठीक उसके सामने खड़ी थी। लड़की लड़के को रिसीव करने आई थी। लड़के को अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि उसने जो सपना देखा था, वो वाकई में सच हो गया। लड़का पागल हो गया और बिना दुनिया की परवाह किये स्टेशन पर ही लड़की को जोरदार झप्पी दे डाली।
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