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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Wednesday, 25 May 2016

लघुकथा :- सुनहरा सपना

आज लड़का पहली सैलरी के बाद घर लौट रहा था।एक तो उसे घर आने की जल्दी थी, उपर से टिकट की मुसीबत। लड़के ने ट्रेन के जनरल डिब्बे में ही सफर करना उचित समझा। लड़के ने लड़की को इतल्ला कर दिया था कि वो आज शाम तक पहुंच जायेगा। लड़की ने भी कल सुबह मिलने की बात कही और कहा कि कल ही बात करते है। लड़के को लड़की का ये बिहेवियर थोड़ा अजीब लगा। खैर उसने लंबी सांस ली और अपनी सीट पकडकऱ बैठ गया। उसके बाद लड़के के मोबाइल का नेटवर्क पुरानी गर्लफ्रेंड की तरह आने जाने लगा, लड़की से संपर्क साधना मुश्किल था। देखते ही देखते लड़के की आंख लग गई और उसने बड़ा ही सुनहरा सपना देखा। लेकिन एक सहयात्री के धक्के ने लड़के के सपने को क्षणभंगुर कर दिया और उसे हकीकत से रूबरु कराया। चार घंटे की यात्रा के बाद आखिरकार लड़का अपने शहर पहुंच ही गया। जैसे ही वो ट्रेन से उतरा, किसी ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ मारा। लड़का तैश में आकर पीछे मुड़कर मारने ही वाला था कि वो एक ही पल में शेर से भीगी बिल्ली बन बैठा। जैसे उसे गहरा सदमा लगा हो। लड़की ठीक उसके सामने खड़ी थी। लड़की लड़के को रिसीव करने आई थी। लड़के को अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि उसने जो सपना देखा था, वो वाकई में सच हो गया। लड़का पागल हो गया और बिना दुनिया की परवाह किये स्टेशन पर ही लड़की को जोरदार झप्पी दे डाली।

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