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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Monday, 11 April 2016

लघुकथा :- एहसास

लड़का चंचल था | लड़की अल्हड़ सी | लड़का सबका लाड़ला था और लड़की सबकी प्यारी | लड़का कुछ ना कहता और लड़की बहुत कुछ सुन लेती थी | आजकल कुछ पक रहा था दोनों के बीच | लड़का लड़की को आजकल उसके वजूद का एहसास दिला रहा था | झल्ली लड़की आजकल बनने संवरने लगी थी | जींस पैंट से सलवार-कमीज पर आ पहुंची थी | माथे पर बिंदी और होंठो पर लाली बनी रहती थी | एक दिन लड़का आया और लड़की को किसी से मिलाने ले गया | लड़की को लगी आज बात पक्की है | पर लड़के ने लड़की को जिससे मिलवाया वो उसकी स्टैम्प पेपर वाली प्रेमिका थी | लड़की ने इस नई प्रेमिका को सिर से पैर तक अपनी आंखों से नापा | मन ही मन कुछ बुदबुदाई और फिर दोनों को बधाई दी और वहां से निकल पड़ी | रास्ते में चलते हुए लड़की ने अपने पर्स में से लिपस्टीक निकाली और कूड़ेदान में जोर से दे मारा | अगले कदम पर माथे से बिंदी नोचते हुए लड़की खुली सड़क पर बेहताशा चल पड़ी |

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