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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Monday, 11 April 2016

लघुकथा :- समानांतर

लड़के को क्रिकेट पसंद था | लड़की को सिंगिग | दोनों की पसंद अलग अलग थी पर दिल लगभग एक | पूरे मोहल्ले में वैलेनटाइन्स डे का बोलबाला था | कोई गुलाब के फूल खरीद रहा था, तो कोई कार्डस् और चॉकलेट्स | लड़के लड़की को भी आज मिलना था | दोनों पास के ही एक कैफे में मिले | न फूल था, न कार्ड और नाही चॉकलेट...दोनों खाली हाथ आये थे | दोनों ने एक एक कॉफी और ब्रॉउनी आर्डर की | कॉफी पीते पीते लड़की ने कहा, 'कैसे हो तुम यार...आज के दिन भी खाली हाथ आये हो| शरम नहीं आती' लड़का मुस्काया और जेब से एक लिफाफा निकालकर लड़की को दे दिया | लड़की ने लिफाफा खोला, तो उसमें से अगले हफ्ते होनेवाले म्युजिक कॉन्सर्ट के टिकट निकले | लड़की खुशी के मारे फूल के कुप्पा हो गई | लड़की ने लड़के का हाथ थामा और कहा, 'देखो, मैं भी खाली हाथ नहीं आई.. जैसे तुम मुझे समझते हो, वैसे ही मैं भी तुम्हें खुब समझती हूं | अब जरा अपना मेल आईडी चेक करना तो!' लड़के ने अपना फोन निकाला और मेल बॉक्स चेक किया | लड़की ने अगले टी२० मैच की टिकट बुक कर रखी थी लड़के के लिए | लड़का लड़की दोनों भीतर ही भीतर अपनी छोटी छोटी जीत पर खुश हुए | कुछ ही दिनों बाद बाकी जोड़ियों के फूल खराब हो गए, कार्ड कचरे के डब्बे में चले गए और लड़का लड़की का तोहफा अाज भी तरोताजा था |


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