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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Monday, 11 April 2016

लघुकथा :- जीत

मां हमेशा कहती तुम लड़की हो | लड़की जैसी हरकतें किया करो | क्यूं बार बार लड़का बनना चाहती हो | लेकिन ये जो लड़की थी ना वो बड़ी अजीब थी | उसे पता था उसके मां-बाप ने अपना पहला बेटा खोया है और रह रहकर उन्हें ये बात सताती है कि आज बड़ा बेटा होता, तो शायद जिंदगी और आसान और सुकुनभरी होती | लड़की ने शुरु से ही ठान लिया था कि मां-बाप को बेटे का प्यार भी देगी और बेटी का सुख भी | घर के काम से लेकर बाहरी जीवन तक लड़की ने धीरे धीरे तालमेल बिठाना सीख लिया | कभी हारती, कभी जीतती...लड़की रोजाना एक जंग लड़ती | किसी को यकीन हो न हो | लड़की के पिता को जरूर यकीन था कि बेटी एक दिन कुछ न कुछ करेगी | मां हमेशा ताने कसती | पिता से इतना ना पढ़ाने को कहती | सोचती जितना पढ़ेगी उतना दहेज देना होगा | लेकिन कहते है ना कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती | आज लड़की के जीवन का खास दिन था | लड़की ने कॉलेज में टॉप किया था और इसी के साथ स्कॉलरशिप की बड़ी रकम भी मिली थी | मां ने आज जब बेटी को स्टेज पर पुरस्कार लेते देखा, तो अभिभूत हो उठी | धीरे से लड़की के पिता के कान में बोली, 'हमनें हमारा बेटा खोया नहीं | वो यही है हमारे साथ और हां कहे देती हूं इसे आगे और पढाना है | मेरी बेटी को अब दहेज देने की कोई जरूरत नहीं | मेरी बेटी हिरा है हिरा और अब तो नौबत आई तो उल्टे मैं दहेज लूंगी tongue emoticon !' इसी के साथ मां-बाप के आंखों के आंसू कंधे तक गिर पड़े |


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