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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Monday, 11 April 2016

लघुकथा :- बदलाव

पूरे घर में शादी का माहौल था | तकरीबन ५ साल बाद पूरा परिवार अपने पैतृक गांव पहुंचा था | लड़की की चचेरी बहन की शादी थी | लड़की पिछली बार जब यहां आई थी, तब बहुत छोटी थी | लेकिन अब सयानी हो चली थी | पूरा घर टेन्ट, पंडित, शादी का सामान, लड़की के बक्से में जाने वाली चीजें, बारातियों का खाना, हॉल की सजावट और खाने के मेन्यू की आवाज से गूंज रहा था | लड़की से हमेशा नफरत करने वाले चाचाजी इस बार न जाने क्यों हर बात में लड़की की सलाह ले रहे थे | पैसे के हिसाब किताब में भी उसे हर बार साक्षी बनना पड़ता था | ये पूरे घरवालों के लिए अजीब था | गांव के कई लोगों को इस बात से आपत्ति भी थी कि आखिर लड़की को इतनी तवज्जो क्यों दी जा रही है | मर्दों वाले काम में लड़कियों का क्या काम? और इधर लड़की सोचती की अपनी मीडिया की आपाधापी भरी जिंदगी से कुछ पल चुराकर चैन से यहां जीने आई थी, लेकिन यहां तो उसपर और भी जिम्मेदारियां बढ़ गई | खैर जैसे तैसे चचेरी बहन की शादी हुई | बिदाई हुई | सब कुछ अच्छे से हो गया और अब लड़की के भी विदा लेने का वक्त आ गया था | लड़की जब आखिरी बार चाचाजी से मिलने पहुंची, तो चाचाजी की आंखें नम थी | ऱुंधे हुए गले से उन्होंने कहा, 'मैं आज तक तेरे मां-बाप से नाराज रहता था कि आखिर लड़की होते हुए भी वो तुझे इतना क्यों पढा-लिखा रहे है | लेकिन जब मेरी बिट्टो के ब्याह के वक्त मैंने पैसे से पढा-लिखा दामाद और अच्छा घर खरीदने की कोशिश, तब मुझे पता चला कि शिक्षा का कितना महत्व होता है | जा बिटिया आगे बढ और आज से तेरा ये चाचा हमेशा तेरे साथ है |' कमरा पूरी तरह चाचा-भतीजी के आंसुओं से सराबोर हो उठा |

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