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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Monday, 11 April 2016

लघुकथा :- डर

लड़का मयखाने में बैठा शराब पी रहा था | टेबल पर लगभग 4 खाली गिलास पड़े थे अब तक | उसे समझ नहीं आ रहा था कि आखिर वो जो फैसला करके आया है, वो सही है या गलत | रह रह के उसकी निगाहें फोन पर जा रही थी | उसे इंतजार था कि लड़की हर बार की तरह इस बार भी कुछ कहेगी और मामला संभल जायेगा | लेकिन हालात कुछ और बयां कर रहे थे | तकरीबन ५ घंटे इंतजार करने के बाद जब लड़की की तरफ से कुछ जवाब ना आया, तो अब लड़के का दिल घबराने लगा | उसने लड़की को फोन किया, लेकिन फोन बंद था | फिर वो लड़खड़ाता हुआ लड़की के घर जा पहुंचा लेकिन लड़की वहां भी नही मिली | अब लड़के की जान हलक में आ गई थी | उसे किसी अनहोनी के होने का डर सता रहा था | वो भागा भागा तालाब के किनारे पहुंचा, जहां वो दोनों अपने सुख-दुख बांटा करते थे | लड़की ने रो रो कर अपना बुरा हाल बना रखा था | लड़के ने लड़की को जैसे ही देखा, वैसे ही झपटकर गले लगा लिया | लड़की कुछ कहती इसके पहले ही लड़के ने कहा, 'सच में मैं कुत्ता हूं ! कभी नहीं सुधरुंगा | अगर आज कुछ हो जाता तो मैं क्या करता | मैं तो मर ही जाता | फिर किससे लड़ता | मुझे माफ कर दो | मैंने तुम्हारा दिल दुखाया है, ये लो चप्पल और मारो मुझे !' लड़की लड़के की ऐसी हालत देखकर रो भी रही थी और मुस्कुरा भी | इसी के साथ लड़की ने चप्पल उठाई और लड़का आगे आगे भागा और लड़की उसके पीछे |

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