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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Monday, 8 September 2014

सलाम है तुम्हे !!!

मुंबई में त्यौहार के समय सुरक्षा व्यवस्था हमेशा बढ़ाई जाती है। गलियों, चौराहों से लेकर सडको तक सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाता है। हम हमेशा महिला पुलिस कर्मियों को अपना काम करते हुए देखते है। कितनी शिद्दत से वो अपना काम करती है। हम सुरक्षित रहे इसलिए वो सजग रहती है। क्या कभी हमने और आपने ये सोचा है कि कितनी मुश्किलो का सामना कर, वो अपना काम करती है।
महिला पुलिसकर्मी को एक महिला होने के नाते कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। घर और नौकरी, दोनों की ही जिम्मेदारी को बराबर सम्भालना पड़ता है। इतने बिजी शेड्यूल में भी ये खुद को मजबूत रखती है और अपनी ड्यूटी को बखूबी निभाती है।
इन दिनों हर तरफ अनंत चतुर्दशी की तैयारियां चल रही है और लोग बाप्पा की विदाई में लगे है। ऐसे में महिला पुलिसकर्मियों की भी कई कई घंटो की शिफ्ट लगती है। गिरगाव से लेकर जुहू तक हर तरफ हमें महिला पुलिस कर्मी  अपने काम में व्यस्त नज़र आती है। जितनी बेबाक ये दिखती है, उतनी ही बिंदास ये होती है। मेरे मन में हमेशा इनसे जुड़े कई सवाल घूमते रहे है और आखिरकार पिछले दिनों मुझे ये मौका मिल ही गया कि मैं अपने मन में गोता खाने वाले प्रश्न इनसे पूछ ही लूँ। मेरी मुलाकात अंकिता और पलव्वी से हुई। ये दोनों ही मुंबई पुलिस में कांस्टेबल है। मैंने सबसे पहला सवाल अंकिता से पूछा, 'गणपति में आप किस तरह घर और नौकरी को मैनेज करती हैं ?' अंकिता हँसने लगी और बोली, 'मैनेज करना पड़ता है। पिछले सात सालो से मैं अपने घर की गणपति के विसर्जन में नहीं जा पाई हूँ। मेरे घर की गणपति सातवे दिन विसर्जित होती है और उस दिन भी मैं ड्यूटी पर होती हूँ। हम महाराष्ट्रीयन है और हमारे सभी रिश्तेदारो के घर गणपति बाप्पा आते है। आज तक कभी ऐसा नही हुआ कि मैं अपने पारम्परिक लिबास में उनके घर बाप्पा के दर्शन के लिए जाऊ। जब भी जाती हूँ, यूनिफार्म में जाती हूँ। जुते उतारकर बाप्पा के दर्शन करती हूँ और फिर वापस ड्यूटी पर आ जाती हूँ।' अंकिता की बाते सुनने के बाद एक सवाल पलव्वी के लिए भी था मेरे पास। मैंने उनसे पूछा कि महिलाओ को कई तरह की समस्याऍ होती है। ऐसे में ड्यूटी कैसे करती है आप? पलव्वी शायद मेरे प्रश्न के लिए पहले से ही तैयार थी। पहले थोड़ी झिझकी और फिर बाद में उन्होंने खुल कर बताया कि कैसी ख़राब से खराब स्तिथी में भी वो काम करती है। वो बोली, 'लोगो को लगता है हमारी ड्यूटी बहुत आसान है, जबकि ऐसा बिलकुल नहीं। हमारी ड्यूटी अलग अलग जगहो पर लगाईं जाती है। कही कही तो टॉयलेट की भी सुविधा नहीं होती। ऐसे में हमें आसपास रहने वाले लोगो के घर जाना पड़ता है। कुछ लोग अच्छे होते है, वो जाने देते है पर कभी कभी ऐसा नहीं होता है। कई बार हमें घंटो यूरिन को रोक कर रखना पड़ता है। इंतज़ार करना पड़ता है ड्यूटी खत्म होने का। पीरियड्स के दिनों में स्तिथी और भी गंभीर होती है। हम फिर भी अपनी ड्यूटी पूरी निष्ठा से निभाते है और जब सब कुछ अच्छी तरह से हो जाता है तो हमें बहुत ख़ुशी होती है।'
अंकिता और पलव्वी दोनों की ही बाते दिल को छू गई। ये हमारी सुरक्षा के लिए कितनी कठिनाइयों का सामना करती है। सलाम है उन तमाम औरतों को जो पुलिस में है और इस तरह से अपना काम करती है। सलाम है तुम्हे 

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