About Me
- Shivangi Thakur
- नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।
Saturday, 5 July 2014
रविवार ! अब नो मोर यार !!!!
एक ज़माना हुआ करता था, जब हम सभी रविवार का बेसब्री से इंतज़ार किया करते थे। उस दिन हमें स्कूल से लेकर ट्यूशन और होमवर्क तक दोनों से ही आज़ादी मिल जाती थी। जैसे जैसे हम बड़े हुए, वैसे वैसे जीवन की व्यस्तता बढ़ती चली गई और फिर हमारे जीवन से रविवार नामक दिन धीरे धीरे गायब होता चला गया। अब तो ये रविवार महज किसी सपने सा लगता है। पता नहीं ये कब आता है और कब चला जाता है ? हम अपने जीवन के सफर में इतने मशगूल है कि हमें ये रविवार दिखाई ही नहीं पड़ता। छोटे बच्चो को देखकर लगता है कि कितने खुशनसीब है ये लोग, जो रविवार को जीते है। अपने हफ्ते भर की थकान इस रविवार के नाम कर देते है। इस आपाधापी भरे जीवन में अगर हमें गलती से भी रविवार को छुट्टी मिल जाए, तो भी हम उस दिन आराम नहीं फरमा सकते। क्यूंकि हम अपने हफ्ते भर के निजी कामो को रविवार के भरोसे छोड़ रखते है। इसलिए उस दिन भी आराम हराम है। इंसान मशीन बन गया है और रविवार बैटरी। अगर ये बैटरी हमें नहीं मिली, तो धीरे धीरे ये मशीन ख़राब हो जायेगा।
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