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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Tuesday, 3 June 2014

खुला पत्र भगवान जी को !!!

"हे भगवान,

आप जहा भी रहते हो। जहां भी बसते हो। जिस किसी भी मंदिर में रहते हो या जिस किसी भी पत्थर पर बसते हो। माँ के पूजा घर में हो या छोटी बहन के किताब में हो। पापा की गाडी में लटकी तस्वीर में हो या क्लासरूम के बाहर बनी मूर्ति में हो। मेरी आपसे एक विनती है। आप बेवक्त किसी को भी यूँ अपने पास बुलाया ना करो। आप अपनी सहूलियत के लिए तो लोगो को अपने पास बुला लेते हो, पर क्या कभी सोचा है। जिन्हे आप अपने पास बुलाते हो। उनके जाने के बाद, वो जो भी अपने पीछे छोड़ जाते है। उनका क्या हाल होता है? कभी आपने यमराज से ये कहा है कि यम तुम लोगो को उठाने से पहले ज़रा उनकी ज़िन्दगी से जुडी तमाम चीज़ो का भी मुआयना करते आना। भगवान सच कहती हूँ। आप एक बार ये आजमा कर देखो। तब आपको पता चलेगा। आप खुद तो ऊपर बैठे सभी चीज़ो को देख रहे हो। इंसानी पीड़ा को भी समझ रहे हो। फिर क्षणिक आवेश में आकर क्यू किसी को यूँ बुला लेते हो? कभी तो हम बच्चो की सुनो। आपको पता भी है कि कितना दर्द होता है? कोई अपना जब यूँ अचानक आपके पास से चला जाता है। एक तो आपने इंसानो का दिल भी इतना कमज़ोर बनाया है। उस पर ऐसे ऐसे झटके देते रहते हो। आप खुद सोचो। आपके पास जो ये यमराज है, अगर वो कही अचानक आपको छोड़ के चला जाए, तो आपको कैसा लगेगा ? हो जाओगे ना आप भी अकेले? आपको भी दर्द होगा ना? आपके पास तो केवल ये यमराज है, पर जिस इंसान को आप ऊपर बुलाते हो। उसका तो सोचो। उसका तो एक परिवार है। कुछ दोस्त भी है। कुछ सहकर्मी भी है। जिस समाज में वो रहता है, वो भी तो उसी का है। आप केवल अपनी ख़ुशी की खातिर इतने लोगो को नाराज़ कैसे कर सकते हो भगवान? मैं आपसे लड़ नही रही हूँ और शिकायत भी नही कर रही हूँ। मैं तो बस आप तक ये सन्देश पहुचना चाहती हूँ कि एक बार आप आकर देखो क्या बितती है उन परिवारों पर. जिनके बाशिंदे आप ऊपर बुला लेते हो। "

ये लेटर आगे तक फॉरवर्ड करते जाइये, एक ना एक दिन भगवान तक तो जरूर पहुँच जायेगा। 

1 comment:

Manish said...

जीवन के यथार्थ पर भगवान मौन हो जाते हैं. उनके मौन में ही सब छिपा है.
काफी अच्छा लिखा है आपने.. हम तो सालों से कहते आ रहे हैं कि भगवान हमको भी उठा लो.. प्रेयसी को तो उठा ले गये हो.. थोड़ी पीड़ा कम कर दो.. लेकिन वो हमेशा की तरह मौन हैं.