About Me

My photo
नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Sunday, 1 June 2014

अंग्रेजी की दुलत्ती मार !!!

आजकल अंग्रेजी का ज़माना है। जिसे देखो वही धाँय धाँय अंग्रेजी झाड़ता है। इस लिस्ट में मैं भी आती हूँ पर क्या करू? आजकल बाहरी वातावरण है ही ऐसा। ज़रा सोचिये अगर कोई अंग्रेजी की घुट्टी बिना पिए किसी बड़े शहर में घूमने निकल जाए, तो उसकी क्या हालत होगी?

मूवी टिकट लेने से लेकर फ़ूड काउंटर तक लोग फर्राटेदार अंग्रेजी का प्रदर्शन करते है। ऐसे में बेचारे का अंग्रेजी ज्ञान ना होने के कारण या तो वो फिल्म नही देख पायेगा या फिर भूखा ही रह जायेगा।

अंग्रेजी हम पर इतनी हावी है कि बच्चा पैदा होते ही हम उसे पहले अंग्रेजी के ए बी सी डी शब्द सिखाने लगते है। अपनी मातृभाषा तो वो बाद में भी सीख लेगा, ऐसा मान कर उसे दिन रात अंग्रेजी के आगे पीछे घुमाते रहते है।

अंग्रेज़ीपन ने सामान्य बोली का हनन कर दिया है। ना तो इंसान आजकल सामान्य दिखता है और नाही सामान्य बोली बोलता है। उसके ऊपर भी अंग्रेजी आवोहवा इस कदर हावी है कि अंग्रेजी को दिन रात अपने साथ लिए घूमता रहता है।

कभी अपने मोबाइल पर तो कभी अपनी जुबान पर।  कभी हाथ से लिखे गए लेटर पर या फिर कभी कोई मेल करते हुए किसी कीबोर्ड के बटन पर। इंसान लाचार है। लेकिन इस लाचारी का कारण वो खुद बना है।

बोलचाल को आसान बनाने का काम करती है भाषा। लेकिन जब वही भाषा मुसीबत का सबब बन जाए, तो बेचारा इंसान क्या करें। अंग्रेजी आना आपको 'कूल' बनाती है। पर अंग्रेजी ना आना आपको 'नामाकूल' बना देती है।

अब ये आप सोचिये आपको क्या बनना है ? कूल या नामाकूल ??


No comments: