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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Sunday, 25 May 2014

मेरी लिखी लघुकथाएँ !!!

21.
बहुत छोटी थी, तब रमा बुआ को देखा था. उनकी धुंधली सी आकृती मेरे जेहन में थी. लंबे लंबे कमर तक लटकते केश, गोल सफेद दमकता हुआ चेहरा और साढ़े पांच फुट की लंबाई. उनकी सुंदरता ऐसी थी कि लोगों के पास शब्द कम पड़ जाते. तकरीबन एक दशक बाद आज मैं रमा बुआ से मिली. मेरे जेहन की रमा बुआ से ये रमा बुआ कहीं मेल खाती नजर नहीं आ रही थी. सिर के बाल अब लंबाई में आधे भी नहीं रह गए थे, चेहरा सूखकर अंदर की तरफ धंस गया था. मां उनसे सब खैरियत पूछ रही थी, और मैं उनमें अपनी वो पुरानी रमा बुआ तलाश रही थी. मां को भी मेरी तरह उन्हें ऐसी हालत में देखकर सदमा लगा था, फिर मैंने पूछ ही लिया, 'मां, रमा बुआ को क्या हो गया है?'
मां ने थोड़ी देर चुप्पी साधी, अपने आंख में तैरते आंसुओं को बाहर आने से रोका और कहा, 'रमा भी घरेलु हिंसा का शिकार हुई है बेटा !!!'



22. 
अपनी बेरंग जिंदगी से परेशान थी वो. सड़क के बीचोंबीच मौत को गले लगाने आ खड़ी हुई थी. उसके जेहन में बार बार अपने जीवन के हर एक पल का स्लाइड शो चल रहा था. शरीर सुन्न था. आसपास इतनी हलचल थी, पर उसके भीतर एक गहरी खामोशी थी. सामने से गाड़ी तेज रफ्तार में आ रही थी. ज्यों ज्यों गाड़ी और उसके बीच का फासला कम होता जा रहा था, त्यों त्यों वो अपने अंतिम सांसों के करीब जा रही थी. गाड़ी और वो...!!!
वो और गाड़ी !!! सनसनाती गाड़ी लगभग उसके करीब आ पहुंची थी, इतने में उस गुप्प अंधेरे में किसी शख्स ने उसे दूसरी तरफ धकेल दिया. वो गिर पड़ी, फिर खुद को संभालती हुई खड़ी हो गई और उस शख्स को तलाशने लगी, जिसने उसे ये नासमझी करने से रोक लिया. गाड़ी के बहाव के साथ ही वो शख्स भी कहीं बह गया था. उसके ना मिलने पर वो मरने का ख्याल छोड़ घर वापस लौट आई. और कसम खाई की आज के बाद वो दुबारा ऐसी गलती कभी नहीं करेगी.


23. 
८ वर्षीय रमा ट्रेन में ऊपर की बर्थ पर सोई हुई अपने पिछले कई दिनों की थकान को नींद से दूर कर रही थी. ट्रेन की रफ्तार सहसा तेज हो उठी और अचानक रमा की नींद खुल गई. उसने देखा कि सामने की बर्थ पर एक नौजवान युवक आ लेटा था, जो उसे एकटक निहारे जा रहा था. रमा दूसरी तरफ मुंह घुमा के सो गई. थोड़ी देर बाद वो फिर गहरी नींद में थी. इस बार मां ने उसे खाने के लिए जगा दिया और खाना ऊपर ही परोस दिया. लड़का अब भी यूं ही उसे देख रहा था. रमा ने फिर उसे घूरा और खा-पीकर सो गई. तकरीबन एक घंटे बाद वो टॉयलेट जाने के लिए उठी. इस बार भी उसने देखा कि लड़का उसे ही देख रहा है. वो उस लड़के को एक गंदा सा लुक देकर टॉयलेट की तरफ बढ़ी. वापस आने के बाद फिर मुंह फेरकर सो गई. सोने के चंद मिनटों बाद ही ना जाने उसे क्या सूझा?
उसने मुड़कर लड़के की तरफ देखा, लड़के ने रमा की ओर एक प्यारी सी मुस्कान फेंकी, पर रमा ने मुस्कान को कैंच न करते हुए परे ढकेल दिया और इस बार भी रूड लुक देकर सो गई. लड़का भी मुंह घुमाकर सो गया. सुबह जब रमा की नींद खुली, तब उसने देखा, वो लड़का नदारद था. रमा ने सोचा शायद टॉयलेट गया होगा, पर थोड़ी ही देर बाद उस सीट कोई और सज्जन आ विराजमान हुए. रमा ने अपने दिल में अफसोस जताया और दबे शब्दों में खुद को कोसती हुई बोली, 'ओह्...वो चला गया. काश, मैंने रिटर्न स्माइल पास कर दिया होता.'



24. 
तेज रफ्तार से दौड़ती गाड़ियां, हाईवे पर बजते जोरदार हॉर्न और इन सब के बीच अपनी ऑटोरिक्शा में अकेली बैठी वर्षा. ट्राफिक को कोसती हुई और अपने मोबाइल पर उंगलियां फेरती हुई. इसी बीच ट्राफिक के शोरगुल से अचानक आती एक एंबुलेंस की आवाज. ट्राफिक के खुलने पर गाड़ियों ने अपनी अपनी जगह बदली और एंबुलेंस ठीक वर्षा के रिक्शे के समानांतर चलने लगी. वो एंबुलेंस को देख रही थी. ड्राईवर के माथे पर उभरती शिकन, आगे बैठे रिश्तेदारों के चेहरे पर भय और शंका और पीछे का बंद दरवाजा. वर्षा लगातार उस एंबुलेंस और उसके कार्यकलापों को देख रही थी. ना जाने उसे क्या सूझा? उस बंद एंबुलेंस के भीतर चल रहे संघर्ष को वो देखना चाहती थी. किसी इंसान को जिंदगी और मौत के बीच डटकर लड़ते हुए देखना चाहती थी. रिक्शवालेे से कहकर उसने एंबुलेंस के पीछे पीछे चलने का फैसला लिया. एंबुलेंस के अस्पताल पहुंचते ही आनन फानन में मरीज को आई.सी.यू. में ले जाया गया. वर्षा अस्पताल के बाहर खड़े होकर सब देख रही थी. परिवारजनों का रोना, भगवान को गुहार लगाना और डॉक्टर से विनती करना. सब कुछ देख रही थी वो. आखिरकार वो भी भगवान के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो ही गई, वो जानती थी कि मरीज उसका कोई नहीं लगता, पर इंसानियत का तो रिश्ता था. दो घंटे की जद्दोजहद के बाद आखिरकार डॉक्टर बाहर आया और उसने कुछ ऐसा कहा कि वर्षा ने सुकुन भरी सांस ली और वहां से चल पड़ी. वो शब्द थे, 'अब चिंता की कोई बात नहीं, मरीज खतरे से बाहर है  '


25.
उसे पोहे-जलेबी बहुत पसंद थे. मेरी और उसकी जोड़ी भी पोहे और जलेबी सी थी. वो पोहे सा नमकीन और छितराया हुआ और मैं जलेबी सी मीठी और सिमटी हुई. हम दोनों का रिश्ता सुबह की पहली खुराक सा था. आज टेबल पर मां ने नाश्ते में जलेबी और पोहे परोसे थे. नाश्ता देखकर पुरानी यादें फिर ताजा हो गई और उसकी याद ने एक बार फिर दिल के टीस को और उभार दिया. नाश्ते की प्लेट को दरकिनार कर, मैं जलेबी के सूखे रस की तरह सख्त और निढाल हो गई और उसकी नमकीन यादें हमेशा की तरह अब कड़वाहट में बदल गई.

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