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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Sunday, 25 May 2014

मेरी लिखीं लघुकथाएँ !!!

26.
वो बार बार अपने सारे जीन्स पैंट को पहन पहन कर देखता. कितने शौक से उसने ये सब खरीदें थे. हर बार जीन्स बदलते वक्त उसके आंसू छलक पड़ते. आज आखिरी दिन था उसका इन दोनों पैरों के साथ, कल से तो केवल सिर्फ एक पैर का सहारा था. कैंसर के कारण कल उसके एक पैर को उसके शरीर से अलग कर दिया जानेवाला था. वो अपने भरे पूरे शरीर को आईने में निहारते हुए फिर आंसुओं की आगोश में समा गया.


27. 
रिया अपने हाथ में मां पापा की तस्वीर लिए मंदिर के सामने बैठे बोली जा रही थी!
'ये लाईफ और आसान नहीं हो सकती क्या? मां पापा फिर एक नहीं हो सकते क्या? मैं थक गई हूं, कॉलेज में झूठ बोल बोल कर! हर बार पैरेंन्टस मीटींग में बहाना बना देती हूं कि पापा बीमार है! मां इतनी व्यस्त है अपनी समाजसेवा में, कि मेरी ओर तो उनका ध्यान भी नहीं जाता! पापा से दिल करता है बात करने का तो, फोन पर हर बार उनकी सेक्रेटरी उठाती है और कहती है,' सर इज बिजी!' पापा जब हमारे साथ रहते थे, तो कम से कम रात का डिनर तो हम साथ में ही किया करते थे! कितने गप्पे लड़ाते थे हम! मैं और पापा मिलकर मां की खूब खिंचाई करते थे, बड़ा मजा आता था! कब लौटेगें वो सुनहरे दिन! क्या एक डिवोर्स से मां पापा का रिश्ता खत्म हो गया, क्या मैं पापा के लिए कुछ नहीं रही! क्या मां पापा के लिए कुछ नहीं रही! मां पापा के होते हुए भी मैं खुद को इस दुनिया में अकेला महसूस करती हूँ! प्लीज गॉड हेल्प मी! मुझे मेरे वही पुराने वाले मां पापा लौटा दो! आय बेग यू  '


28. 
ससुराल में आते ही माला अपने गुण बिखरने लगी थी, आस पड़ोस की लड़कियों को अपने घर बुलाती. कभी पढ़ाती, कभी उनके साथ खेलती, कभी सीना-पिरोना सिखाती. माला के घर ने पाठशाला का रूप धारण कर लिया था. कभी कोई बिमार हो जाती, तो माला तुरंत उसके घर जाती, उसकी सेवा करती, गाकर या कहानियां सुनाकर उसका मन बहलाती. धीरे धीरे परिवार वालों को माला की ये सेवा अखरने लगी. पर माला की सेवा-प्रवृत्ति जरा भी कम न हुई. उसे घर से निकाल दिया गया. पर उसने हिम्मत नहीं हारी और जिन लड़कियों के कारण वो बेघर हुई थी, आज वही लड़कियां ढाल बनकर माला साथ के खड़ी है. गांव में महिला सेवादान केन्द्र खुल गया है. माला उसकी संचालिका है और बाकि की लड़कियां आज वहां दूसरी लड़कियों को पढ़ना, खेलना, सीना-पिरोना सिखलाती है.


29. 
गर्मी की चिलचिलाती धूप, आसपास से गुजरते हुए वाहनों से उड़ने वाली धूल और उस वातावरण में गांव के बस अड्डे पर खड़ा अकेला समीर. आज उसकी वापसी का दिन था. जेहन में बार बार अपने गांव और अपने सगों की झलकियां उभर आती थी. शहर वो पैसे कमाने निकला था, पर शहर की चकाचौंध ने उसे चुबंक की तरह इस कदर खिंचा की...गांव उससे कहीं छूटता चला गया. आज वो कई सालों बाद गांव लौटा था, पर गांव के लोगों का प्यार, अपनापन और सादगी आज भी बरकरार थी. शहर में किसी के पास इतनी फुर्सत ही कहां थी जो उसकी इतनी देखभाल करता. यहां तो जहां जाता लोग उसे सिर आंखों पर बिठाते थे. बस अड्डे पर गाड़ियों का आना जाना लगातार बरकरार था, पर समीर के कदम उनमें चढ़ने की इजाजत नहीं दे रहे थे. देखते देखते शाम हो गई और अब आखिरी बस निकलने वाली थी, बस के आते ही हो हल्ला होने लगा. सब लपक कर बस में चढ़ने लगे. समीर भी धक्का खाते बस में चढ़ गया. जैसे ही बस चलने लगी, गांव का एक एक दृश्य समीर के आंखों से ओझल होता जा रहा था. उसे लगा मानों कुछ छूटता जा रहा है. मन में अजीब सी हलचल होने लगी. वो भीड़ से निकलकर बस के दरवाजे पर आया और बस रुकवाई. फिर बस से उतरा और वापस गांव की तरफ चल पड़ा. गांव में वापसी के कदम उसे भीतर से एक ठंडक दे रहे थे. अब उसकी सांसें ताजा होने लगी थी और दिल में राहत और सुकुन की लंबी सी लहर उछाल मार रही थी.


30.
गाड़ी अपनी रफ्तार पर थी. पिछली सीट पर रेवती और सनम चुपचाप बैठे थे. ठीक चार साल बाद एक बार फिर वो दोनों एक रिश्तेदार की शादी में मिलें थे. रेवती को सही सलामत घर पहुंचाने की जिम्मेदारी सनम की थी. कुछ आगे चलने पर गाड़ी में ब्रेक लगी और ड्राईवर थोड़ा हल्का होने उतर गया. वो दोनों एक दुसरे से बहुत कुछ कहना चाहते थे, इन चार सालों में घटित सारी बातें शेयर करना चाहते थे. पर दोनों में से किसी ने जेहमत नहीं की. गाड़ी और आसपास की खामोशी ने उन दोनों को अतीत में ढकेल दिया. कितना प्यार करते थे वो दोनों एक दूसरे से. पर वक्त ने ऐसा सितम ढाया की रेवती की शादी कहीं और हो गई, और शादी के कुछ दिनों बाद ही वो विधवा भी हो गई. सनम उसे इस हालत में देखकर खुद को बहुत कोसता है. काश, उसने थोड़ी बगावत कर ली होती, तो आज रेवती के हालात ऐसे ना होते. खामोशी अभी भी जारी थी. आखिरकार सनम ने हिम्मत कर पूछ ही लिया, 'तुम ठीक हो ना?' रेवती अभी भी चुप थी, पर उसके भीतर कई बातें थी कहने को. वो कह न सकी. ड्राईवर वापस आया. गाड़ी फिर रफ्तार पर लौटी. खामोशी जस की तस बनी थी. थोड़ी देर बाद घर भी आ गया. सनम रेवती के जवाब का इंतजार कर रहा था. रेवती ने सनम की आंखों में देखा और बोली, 'मैं.......हां मैं ठीक हूं, बस मेरे जीवन में तुम्हारी कमी बहुत खलती है.' इतना कहकर रेवती ने सनम को गले लगा लिया और अपने सारे गमों को आंसुओं में तब्दील कर उसके कंधे पर बहा दिया.

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