उम्मीद, एक नयी सुबह की !!!
पिछले दिनों बिहार में थी। मुंबई जैसे महानगर में रहते हुए मुंबई और बिहार के विकास की तुलना करना बेमानी सा लगता है। खैर तुलना तो अपनी जगह है, पर विकास के मॉडल के नाम पर मैंने क्या कुछ देखा ? उसका एक उदाहरण ये देखिये।
राह चलते मुझे किसी भी चीज़ की तस्वीर उतार लेना अच्छा लगता है। फोटोग्राफी का शौक है। जब गाँव घूमने निकली, तो अकस्मात ये बच्चा मुझे दिखाई पड़ा। मैंने इसे रोक कर एक तस्वीर उतार ली। बात तस्वीर की नहीं, इस बच्चे की स्तिथी की है। इस छोटी सी उम्र में सिर पर मिट्टी धोता हुआ। पैरों में चप्पल नदारद। चेहरे पर एक अजीब सी उदासी और अपने घर जल्दी जाने की चेष्टा।
इस बच्चे को देख दिल्ली, मुंबई के वो तमाम बच्चे याद आ गए, जो इस उम्र में एल.के.जी. या यू.के.जी. में पढ़ते होंगे। माँ की देखभाल और पिता के प्यार के बीच वो अपना सारा दिन बिताते होंगे, और उन्ही का हमउम्र ये बच्चा अपने जीवन की कठिनाइयों का खुले कदमो से स्वागत करता हुआ सामना कर रहा है। इस बच्चे ने शायद ही कभी मैकडोनाल्ड्स का नाम सुना होगा, शायद ही कभी पिज़्ज़ा, बर्गर या आइसक्रीम खायी होगी। लेकिन इसके मन में भी तो कुछ आकांक्षाएं होंगी? ये भी तो औरो की तरह खेलना चाहता होगा, स्कूल जाना चाहता होगा। देश में बच्चो की शिक्षा को लेकर कई बड़े बड़े प्रोग्राम चलाये जा रहे है, पर इसकी जमीनी हकीकत क्या है, इस पर शायद ही किसी की नज़र है। ना तो मैं बिहार की बुराई कर रही हूं, और नाही मैं मुंबई को महान बता रही हूँ। पर यहाँ सवाल उठता है, देश के भविष्य का। एक तरफ बच्चे आसमान छू रहे है, पढ़ने के लिए विदेश तक चले जाते है। दूसरी तरफ प्राथमिक आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पाती है।
बड़ा दुःख महसूस होता है, जब अपने ही गाँव की ऐसी हालत देखती हूँ तो। सरकार आती है, जाती है। घूसखोर सारा पैसा खा जाते है, और इन मासूमो के भविष्य के साथ खिलवाड़ होता है।
ना जाने कब वो दिन आएगा, जब भारत का बच्चा बच्चा स्कूल जायेगा !!!!!!!!!!!!!!!
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