11.
मां, अब क्यूं? काहे रो रही है...तब रोना नहीं आया था, जब इन निर्मोहीयों के घर मुझे ब्याहता बनाकर भेजा था| तब तो बड़ी खुश थी ना तू कि मेरी बन्नी राजबन्ना के घर जा रही है| राज करेगी मेरी राजदुलारी| देख मां, आज तेरी ऱाज दुलारी फुलों के बिस्तर पर पड़ी है| सिर से पांव तक सुहागन की तरह संवरी है| चारों ओर लोगों का मेला लगा है| जब तेरे घर से विदा हुई थी, तब तो सिर्फ तू रोई थी| आज देख ये कसाई लोग भी मगरमच्छ के आंसू टपका रहे है| कितना तो दिया था तूने दहेज में....पर इन भूखों की भूख इतने से कहां मिटने वाली थी| बस अब जा रही हूं, तू रोना मत| और हां इन कसाईयों को छोड़ना भी मत...बहुत तड़पाया है इन लोगों ने मां| मैं कभी तुझसे ये सब कह नहीं पाई| जानती थी, तू टूट जाएगी| जा रही हूं मां...अलविदा!!!'
और धीरे धीरे लता की आत्मा आसमान में विलिन होने लगी|
12.
पति पत्नी में आपस में हल्की- फुल्की नोंक झोंक चल रही थी| पत्नी बोली, 'बच्चो के लिए पिता एक खिलौना है, खेलने की ऐसी चीज है, जो बच्चे को उछाले, दुलारे, प्यार करें, तरह तरह के तोहफे दिलाए बस| पर मां उनके लिए दाल-भात की तरह होती है, जिसके बिना उनका एक दिन भी गुजारा नहीं होता| खिलौने के बिना तो वो एक दिन रह भी लेगें, लेकिन दाल-भात के बिना उनका चलने वाला नहीं| खिलाने वाला व्यक्ति भले ही बदल जाए, बच्चे पिता की जगह किसी और को दे भी सकते है, पर उनकी मां उन्हे वैसी ही चाहिए| जस की तस...वही रुप, वही रंग, वही काया और वही सुगंध....'
पत्नी की आकाशवाणी चालू ही थी, इतने में सोनाली आई और पापा को गले लगाते हुए बोली, 'पापा, आई लव यू....आप दुनिया के बेस्ट पापा हो| मम्मा तो हमेशा मुझे डांटती रहती है| आप ही मुझे प्यार करते हो|' पति जी मुस्कुराएं और पत्नी से मुखातिब होकर बोले, 'हां तो अभी अभी आप कुछ कह रही थी, पिताओं के बारे में...जरा कंन्टिन्यू करेगीं|' पत्नी झेंप गई और सोनाली पापा के साथ खेलने लगी|
13.
रितु आज पहली बार मैदान पर पहुंची थी | उसने आज से पहले केवल रोहन के क्रिकेट खेलने के अंदाज के बारे में सुना था | आज पहली बार उसे अपनी आंखों सेे लाइव देखने स्टेडियम पहुंची थी | रोहन इस बात से बेखबर, अपने मैच पर कॉन्सनट्रेट कर रहा था | रोहन जब भी छक्के चौके मारता, रितु जोर से स्टेडियम में चिल्लाती | देखते ही देखते रोहन ने पचास रन पूरे कर लिए | जब वह पानी पीने के लिए रूका, तो रितु उससे मिलने आई | रोहन आर्श्चयचकित था, रितु को देख कर | बहुत खुश हुआ वो | जब रोहन क्रिज पर वापस लौटा, तो उसका ध्यान बार बार रितु पर जा अटकता था | आखिरकार एक ओवर के बाद वो आउट हो ही गया | हाए बेचारा रितु के चक्कर में वो वापस पवेलियन लौट आया | रितु स्टेडियम से निकलकर उसके पास आई और कहा, 'क्या हुआ रोहन?' रोहन मुस्कुराया और बोला, 'कुछ नहीं इडियट, तुम्हे देखने के चक्कर में मैं आउट हो गया| अगली बार से तुम मत आना, वरना मैं यूं ही आउट होता रहूंगा...समझी |'
रितु के साथ पवेलियन में बैठे सारे लोग रोहन की बातों पर हंसने लगे|
14.
कार में बैठे बैठे वो हर जगह अपने पोस्टर देख रही थी! बड़े बड़े होर्डिंग के रूप में उसकी तस्वीर शहर के बीचोंबीच लगी थी! हिरोईन बनने का उसका सपना, आखिरकार साकार हो ही गया! ना जाने क्या क्या पापड़ बेले उसने इस मुकाम को हासिल करने के लिए! घर, मां-बाप, दोस्त, अपना शहर, पुरानी जिंदगी सब कुछ छोड़, वो बस मुंबई चली आई थी! कार से वो जब भी बाहर झांकती, अपने पोस्टरों को देख उसके चेहरे की मुस्कान दुगुनी हो जाती! अचानक सिग्नल पर उसकी गाड़ी रूकी! उसने खिड़की से बाहर झांका! एक भिखारिन अपनी बेटी को दुलार रही थी! मां की ममता देख वो अभिभूत हो उठी! उसकी मां भी तो ऐसी ही थी, उसे भी इतना ही प्यार करती थी! कितने नाजों से पाला पोसा था उसे सबने! कितना प्यार करते थे सब उसे! बस एक गलती ने सब कुछ छीन लिया! करोड़ो लोगों के दिलों की धड़कन थी वो, पर अपना परिवार ही उसे नसीब नहीं था! घर छोडकऱ भागने की सजा वो आज तक भुगत रही है! मां की ममता को तो वो आज भी तड़पती है! मां को याद कर उसने सेलफोन उठाया और मां के नंबर पर डायल किया! हर बार की तरह उसे कॉल डिस्कनेक्ट की बीप सुनाई दी! फिर वही निराशा हाथ लगी! मां ने इस बार भी फोन नहीं उठाया! गाड़ी सिग्नल से आगे बढी, और वो सब कुछ भूल कर फिर अपने पोस्टरों में गुम हो गई!
15.
दिपक रोज उसी रास्ते से कॉलेज जाता! सड़क के किनारे उस भिखारी को ऐसी दयनीय हालत में देखकर वो भावुक हो उठता! अपना पिता खोने के बाद हर बूढ़े व्यक्ति में उसे अपने पापा नजर आते! दिपक ने कभी हिम्मत नहीं की उस भिखारी से बात करने की! उस भिखारी का परिवेश था ही इतना भयावह! बालों की लंबाई और दाढी की लंबाई में मानो प्रतिस्पर्धा चल रही हो, कौन सबसे आगे बढ़ेगा! हाथ और पैर के नाखुन कौए के चोंच समान उभरे हुए थे! आँखें ऐसी मानो जैसे कुछ कहना चाहती हो! एक ही पेड़ के नीचे वो पिछले कई सालों से अपना जीवन यापन कर रहा था! कोई कुछ खानें को दे देता, तो खा लेता वरना वही भूखा पड़ा रहता! फटे पैंट और एक शॉल ओड़े, हर मौसम को उसी परिवेश में काट जाता! दीपक कब से व्याकुल था, उस भिखारी के बारे में जानने के लिए! आज पहली बार दीपक के दिल की मुराद पूरी हुई, जब कॉलेज से उसे भिखारीयो की स्थिती पर प्रोजेक्ट करने को मिला!
उसके दिमाग में सबसे पहले वही भिखारी आया, जो उसे रास्ते में दिखाई पड़ता था! वो उस भिखारी के पास पहुंचा! जहां वो बैठा था वहां से इतनी जोरदार बदबू आ रही थी! मैले कपड़ो से आती पेशाब की गंध! पैंट में कई बार कर लिए गए पेशाब ने धारीयाँ बना रखी थी! आसपास मख्खियां भिनक रही थी! दिपक ने उसे जगाया और कहा, ' बाबा, सुनिए!'
'कौन हो तुम? क्या है?' भिखारी ने कुड़बुड़ाते हुए कहा! दिपक ने थोड़ी और सहानुभुति दिखाते हुए कहा, 'बाबा कुछ बात कर सकता हूं, दरअसल कुछ पूछना था!' भिखारी उठ बैठा, पहली बार किसी व्यक्ति ने उसे दुत्कारा नहीं बल्कि थोड़ी सहनुभुति दिखाई! 'बोलो बेटा, क्या पूछना है?' बेटा शब्द सुनकर दीपक की हिम्मत और बढ़ी, उसने कहा, 'आप यहां कैसे आएं?'
भिखारी रो पड़ा....और कहा, 'ये मेरी किस्मत थी बेटा! बच्चों ने मेरे हालात बदल दिए! उन्हे तो अब अपना बच्चा कहते हुए भी मुझे घृणा होती है!' दीपक सब समझ गया कि क्या हुआ था! दीपक को उस पर बहुत दया आई! उसने कहा, 'बाबा मैं हूं ना आपका बेटा! आइए चलिए मेरे साथ! उसने उस भिखारी को वहां से उठाया और उसका हाथ थामते हुए ओल्ड एज होम की तरफ बढ़ चला!
मां, अब क्यूं? काहे रो रही है...तब रोना नहीं आया था, जब इन निर्मोहीयों के घर मुझे ब्याहता बनाकर भेजा था| तब तो बड़ी खुश थी ना तू कि मेरी बन्नी राजबन्ना के घर जा रही है| राज करेगी मेरी राजदुलारी| देख मां, आज तेरी ऱाज दुलारी फुलों के बिस्तर पर पड़ी है| सिर से पांव तक सुहागन की तरह संवरी है| चारों ओर लोगों का मेला लगा है| जब तेरे घर से विदा हुई थी, तब तो सिर्फ तू रोई थी| आज देख ये कसाई लोग भी मगरमच्छ के आंसू टपका रहे है| कितना तो दिया था तूने दहेज में....पर इन भूखों की भूख इतने से कहां मिटने वाली थी| बस अब जा रही हूं, तू रोना मत| और हां इन कसाईयों को छोड़ना भी मत...बहुत तड़पाया है इन लोगों ने मां| मैं कभी तुझसे ये सब कह नहीं पाई| जानती थी, तू टूट जाएगी| जा रही हूं मां...अलविदा!!!'
और धीरे धीरे लता की आत्मा आसमान में विलिन होने लगी|
12.
पति पत्नी में आपस में हल्की- फुल्की नोंक झोंक चल रही थी| पत्नी बोली, 'बच्चो के लिए पिता एक खिलौना है, खेलने की ऐसी चीज है, जो बच्चे को उछाले, दुलारे, प्यार करें, तरह तरह के तोहफे दिलाए बस| पर मां उनके लिए दाल-भात की तरह होती है, जिसके बिना उनका एक दिन भी गुजारा नहीं होता| खिलौने के बिना तो वो एक दिन रह भी लेगें, लेकिन दाल-भात के बिना उनका चलने वाला नहीं| खिलाने वाला व्यक्ति भले ही बदल जाए, बच्चे पिता की जगह किसी और को दे भी सकते है, पर उनकी मां उन्हे वैसी ही चाहिए| जस की तस...वही रुप, वही रंग, वही काया और वही सुगंध....'
पत्नी की आकाशवाणी चालू ही थी, इतने में सोनाली आई और पापा को गले लगाते हुए बोली, 'पापा, आई लव यू....आप दुनिया के बेस्ट पापा हो| मम्मा तो हमेशा मुझे डांटती रहती है| आप ही मुझे प्यार करते हो|' पति जी मुस्कुराएं और पत्नी से मुखातिब होकर बोले, 'हां तो अभी अभी आप कुछ कह रही थी, पिताओं के बारे में...जरा कंन्टिन्यू करेगीं|' पत्नी झेंप गई और सोनाली पापा के साथ खेलने लगी|
13.
रितु आज पहली बार मैदान पर पहुंची थी | उसने आज से पहले केवल रोहन के क्रिकेट खेलने के अंदाज के बारे में सुना था | आज पहली बार उसे अपनी आंखों सेे लाइव देखने स्टेडियम पहुंची थी | रोहन इस बात से बेखबर, अपने मैच पर कॉन्सनट्रेट कर रहा था | रोहन जब भी छक्के चौके मारता, रितु जोर से स्टेडियम में चिल्लाती | देखते ही देखते रोहन ने पचास रन पूरे कर लिए | जब वह पानी पीने के लिए रूका, तो रितु उससे मिलने आई | रोहन आर्श्चयचकित था, रितु को देख कर | बहुत खुश हुआ वो | जब रोहन क्रिज पर वापस लौटा, तो उसका ध्यान बार बार रितु पर जा अटकता था | आखिरकार एक ओवर के बाद वो आउट हो ही गया | हाए बेचारा रितु के चक्कर में वो वापस पवेलियन लौट आया | रितु स्टेडियम से निकलकर उसके पास आई और कहा, 'क्या हुआ रोहन?' रोहन मुस्कुराया और बोला, 'कुछ नहीं इडियट, तुम्हे देखने के चक्कर में मैं आउट हो गया| अगली बार से तुम मत आना, वरना मैं यूं ही आउट होता रहूंगा...समझी |'
रितु के साथ पवेलियन में बैठे सारे लोग रोहन की बातों पर हंसने लगे|
14.
कार में बैठे बैठे वो हर जगह अपने पोस्टर देख रही थी! बड़े बड़े होर्डिंग के रूप में उसकी तस्वीर शहर के बीचोंबीच लगी थी! हिरोईन बनने का उसका सपना, आखिरकार साकार हो ही गया! ना जाने क्या क्या पापड़ बेले उसने इस मुकाम को हासिल करने के लिए! घर, मां-बाप, दोस्त, अपना शहर, पुरानी जिंदगी सब कुछ छोड़, वो बस मुंबई चली आई थी! कार से वो जब भी बाहर झांकती, अपने पोस्टरों को देख उसके चेहरे की मुस्कान दुगुनी हो जाती! अचानक सिग्नल पर उसकी गाड़ी रूकी! उसने खिड़की से बाहर झांका! एक भिखारिन अपनी बेटी को दुलार रही थी! मां की ममता देख वो अभिभूत हो उठी! उसकी मां भी तो ऐसी ही थी, उसे भी इतना ही प्यार करती थी! कितने नाजों से पाला पोसा था उसे सबने! कितना प्यार करते थे सब उसे! बस एक गलती ने सब कुछ छीन लिया! करोड़ो लोगों के दिलों की धड़कन थी वो, पर अपना परिवार ही उसे नसीब नहीं था! घर छोडकऱ भागने की सजा वो आज तक भुगत रही है! मां की ममता को तो वो आज भी तड़पती है! मां को याद कर उसने सेलफोन उठाया और मां के नंबर पर डायल किया! हर बार की तरह उसे कॉल डिस्कनेक्ट की बीप सुनाई दी! फिर वही निराशा हाथ लगी! मां ने इस बार भी फोन नहीं उठाया! गाड़ी सिग्नल से आगे बढी, और वो सब कुछ भूल कर फिर अपने पोस्टरों में गुम हो गई!
15.
दिपक रोज उसी रास्ते से कॉलेज जाता! सड़क के किनारे उस भिखारी को ऐसी दयनीय हालत में देखकर वो भावुक हो उठता! अपना पिता खोने के बाद हर बूढ़े व्यक्ति में उसे अपने पापा नजर आते! दिपक ने कभी हिम्मत नहीं की उस भिखारी से बात करने की! उस भिखारी का परिवेश था ही इतना भयावह! बालों की लंबाई और दाढी की लंबाई में मानो प्रतिस्पर्धा चल रही हो, कौन सबसे आगे बढ़ेगा! हाथ और पैर के नाखुन कौए के चोंच समान उभरे हुए थे! आँखें ऐसी मानो जैसे कुछ कहना चाहती हो! एक ही पेड़ के नीचे वो पिछले कई सालों से अपना जीवन यापन कर रहा था! कोई कुछ खानें को दे देता, तो खा लेता वरना वही भूखा पड़ा रहता! फटे पैंट और एक शॉल ओड़े, हर मौसम को उसी परिवेश में काट जाता! दीपक कब से व्याकुल था, उस भिखारी के बारे में जानने के लिए! आज पहली बार दीपक के दिल की मुराद पूरी हुई, जब कॉलेज से उसे भिखारीयो की स्थिती पर प्रोजेक्ट करने को मिला!
उसके दिमाग में सबसे पहले वही भिखारी आया, जो उसे रास्ते में दिखाई पड़ता था! वो उस भिखारी के पास पहुंचा! जहां वो बैठा था वहां से इतनी जोरदार बदबू आ रही थी! मैले कपड़ो से आती पेशाब की गंध! पैंट में कई बार कर लिए गए पेशाब ने धारीयाँ बना रखी थी! आसपास मख्खियां भिनक रही थी! दिपक ने उसे जगाया और कहा, ' बाबा, सुनिए!'
'कौन हो तुम? क्या है?' भिखारी ने कुड़बुड़ाते हुए कहा! दिपक ने थोड़ी और सहानुभुति दिखाते हुए कहा, 'बाबा कुछ बात कर सकता हूं, दरअसल कुछ पूछना था!' भिखारी उठ बैठा, पहली बार किसी व्यक्ति ने उसे दुत्कारा नहीं बल्कि थोड़ी सहनुभुति दिखाई! 'बोलो बेटा, क्या पूछना है?' बेटा शब्द सुनकर दीपक की हिम्मत और बढ़ी, उसने कहा, 'आप यहां कैसे आएं?'
भिखारी रो पड़ा....और कहा, 'ये मेरी किस्मत थी बेटा! बच्चों ने मेरे हालात बदल दिए! उन्हे तो अब अपना बच्चा कहते हुए भी मुझे घृणा होती है!' दीपक सब समझ गया कि क्या हुआ था! दीपक को उस पर बहुत दया आई! उसने कहा, 'बाबा मैं हूं ना आपका बेटा! आइए चलिए मेरे साथ! उसने उस भिखारी को वहां से उठाया और उसका हाथ थामते हुए ओल्ड एज होम की तरफ बढ़ चला!

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