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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Friday, 4 April 2014

लेखन...

लिखते हुए मुझे केवल ६ महीने ही हुए है। पर लोगों का इतना प्यार देख कर लगता है, ना जाने कितने सालों से लिख रही हूँ। जब तक पत्रकारिता में दाखिला नहीं लिया था, तब तक पत्रिकाएँ, नॉवेल, किताबें ये सब शौकिया तौर पर पढ़ती थी। पर अब तो इन सब को पढ़ने का नज़रिया ही बदल गया है। पहले हर कहानी, बस एक कहानी सी लगती थी। कहाँ क्या गलती है, इसका आकलन करना मेरे बस का नहीं था। पर गुरुजनों की हम पर की गई मेहनत, धीरे धीरे रंग लाती गई। और अब समय ऐसा आ गया है कि हम सब खुद ही कुछ ना कुछ लिख लेते है। हमारी इस लिखावट का सारा श्रेय हमारे गुरुजनो को जाता है।

कई बार लोग मुझसे पूछते है, आप कैसे लिख लेती है ये सब? आपको सूझता कैसे है ये सब?

लिखना एक कला है। और कुछ भी लिखने के लिए जो चीज़ सबसे ज्यादा जरुरी होती है, वो है ऑब्जरवेशन।
मैं कोई बड़ी लेखक नहीं हूँ। फिर भी इतना पता है कि आपकी कलम में दम है, तो दुनिया आपकी लिखावट को जरुर पढ़ेगी। जब भी कुछ बेहतरीन लिखा जाता है, तो हम अक्सर सोचते है कि ना जाने लेखक ने ये सब कैसे लिखा होगा, उसका दिमाग तो बड़ा ही क्रिएटिव टाइप होगा।

हाँ, कुछ लोग क्रिएटिव टाइप होते है, जो कल्पनाओं के समंदर में गोते खाते हुए कई अनमोल मोतियों सी रचनाओ का निर्माण करते है। उनका सोचना दुनिया के सोचने से अलग होता है।

पर वही कुछ लोग अपने अनुभव या फिर अपनी आप बीती को अपनी लेखनी में उतारते है।
इसलिए हर लेखक का अपना अलग लिखने का स्टाइल होता है।
ना तो वो दुसरो की नक़ल कर, अपनी लेखनी में उतार सकता है। और नाही अपने लिखने के स्टाइल को दुसरो की खातिर बदल सकता है।

तो बस कहने का मकसद इतना ही है कि जिन्हे लिखना पसंद है, वो लिखते जाइये और कैसा लिखा है? क्या लिखा है? सही लिखा है? या गलत लिखा है? ये सब पाठकों पर छोड़ दीजिये।

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