1.
हाथ में नवजात शिशु को लिए रौनक पापा की तस्वीर के सामने खड़ा था!
'जिस दिन आप मुझे बिना बताएं चले गए थे ना, उस दिन मुझे आप पर बहुत गुस्सा आया था! जी कर रहा था, सीधे उपर आकर आपसे हिसाब किताब कर लूं! इतनी छोटी सी उम्र में परिवार का सारा भार मुझ अकेले पर छोड़ आप चलें गए, एक बार भी मेरे बारे में नहीं सोचा! ना दीदा के बारे में सोचा, ना छुटकी की चिंता की और ना ही माँ की! माँ तो सिर्फ आपके सहारे ही अपना सब कुछ छोड़कर आई थी ना! हर वक्त मुझे आपकी कमी खलती रही! कॉलेज के पैरेंन्टस मीटींग में, दीदा की शादी में, छुटकी की विदाई में, नौकरी मिलने की खुशी में, मेरे सिर पर सेहरा बँधनेवाले दिन! मुझे पता है, आपसे मेरी बनती नहीं थी! आपके मुताबिक, माँ के लाड़ प्यार ने मुझे बिगाड़ रखा था! पापा आज आकर देखो ना, आपका बिगड़ैल बच्चा कितना सुधर गया है! आप जैसा चाहते थे, वैसे ही सबकुछ संभाला है मैनें! आज मुझे आपकी कमी सबसे ज्यादा खल रही है पापा! लौट आओ ना! देखो आज कितना बड़ा दिन है मेरेे लिए!
मैं भी पापा बना हूँ!' रौनक ने नवजात को चूमा और उसके आंसू छलक पड़े!
'जिस दिन आप मुझे बिना बताएं चले गए थे ना, उस दिन मुझे आप पर बहुत गुस्सा आया था! जी कर रहा था, सीधे उपर आकर आपसे हिसाब किताब कर लूं! इतनी छोटी सी उम्र में परिवार का सारा भार मुझ अकेले पर छोड़ आप चलें गए, एक बार भी मेरे बारे में नहीं सोचा! ना दीदा के बारे में सोचा, ना छुटकी की चिंता की और ना ही माँ की! माँ तो सिर्फ आपके सहारे ही अपना सब कुछ छोड़कर आई थी ना! हर वक्त मुझे आपकी कमी खलती रही! कॉलेज के पैरेंन्टस मीटींग में, दीदा की शादी में, छुटकी की विदाई में, नौकरी मिलने की खुशी में, मेरे सिर पर सेहरा बँधनेवाले दिन! मुझे पता है, आपसे मेरी बनती नहीं थी! आपके मुताबिक, माँ के लाड़ प्यार ने मुझे बिगाड़ रखा था! पापा आज आकर देखो ना, आपका बिगड़ैल बच्चा कितना सुधर गया है! आप जैसा चाहते थे, वैसे ही सबकुछ संभाला है मैनें! आज मुझे आपकी कमी सबसे ज्यादा खल रही है पापा! लौट आओ ना! देखो आज कितना बड़ा दिन है मेरेे लिए!
मैं भी पापा बना हूँ!' रौनक ने नवजात को चूमा और उसके आंसू छलक पड़े!
2.
अरे ये क्या हो रहा है? मुझे वेंटिलेटर पर क्यूं लिटाया है! अभी थोड़ी देर पहले ही तो मैं प्रसव पीड़ा से कराह रही थी, चीख चीख कर हंगामा मचा रखा था मैनें, और अभी ये सब क्या हो रहा है! विवेक, माँ और नीनाताई मुझे हॉस्पिटल लेकर आए थे! कहां है सब कोई दिखता क्यूं नहीं? डॉक्टर क्या कह रहे है, नॉरमल डिलीवरी मुमकिन नहीं था, इसलिए सीजर किया! अरे मेरे पेट का भार कहां गायब हो गया! कितना हल्का महसूस हो रहा है मुझे! ये नर्स मेरे पेट को क्या कर रही है? ये सुई में धागा क्यूं लगाया जा रहा है! और मेरे आस-पास ये गीला गीला और लाल लाल क्या है? अरे ये तो खून है, मेरा खून है! दूसरी नर्स दिखाई क्यूं नहीं पड़ती? अभी तो वो कपड़े में कुछ लपेटकर वॉशरुम की तरफ गई थी! हाँ बच्चे के चीखने की पुकार सुनाई पड़ी थी मुझे! डॉक्टर ये क्या कह रहे है, मुझे पांच घंटे बाद होश आएगा! नर्स उसे कपड़े में लपेटकर वापस लाई है! विवेक के हाथ में उसने उसे थमाया! विवेक उसे चूम रहा है, माँ और नीनाताई उसे दुलार रहे है! 'ओह् कब मुझे होश आएगा! कब मैं भी उसे दुलारुंगी! कब उसे पहली बार स्तनपान करा पाऊंगी! बस कुछ देर और.....!!!'
3.
बड़ी भाभी, छोटी दुल्हन, पुष्पा बुआ, ऱाधा दीदी, हेमा मासी, गुजंन मामी सभी नए ऩए लिबाज पहनकर तैयार हो गए! आज घर की इकलौती बेटी छवि की शादी थी! पूरा खानदाऩ इकट्ठा हुआ था! खुशी का माहौल था घर में! सिमरिया घर की मझली बहू थी! पति के चल बसने के बाद, घर में उसकी हैसियत केवल नौकरों के बराबर थी! 'सिमरिया, सुन तू यहीं रूक जा, वरना बड़ी काकी तुझे मंडप में देखेंगी, तो हम पर ही कुड़बुड़ाएंगी!' बड़ी भाभी ने रसोई की तरफ इशारा करते हुए सिमरिया से कहा! सिमरिया रसोई की तरफ चली गई! पहाड जैसा जीवन अकेले काटने को मजबूर सिमरिया ने छवि में अपनी छवि देखी थी! बचपन से ही छवि को सबसे ज्यादा लगाव अपनी मझली काकी से था, और सिमरिया भी उसपर अपनी जान लुटाती थी! आज तो छवि के जीवन का खास दिन था! वो मंडप में बैठे हुए चारों तरफ नजरें दौड़ती! उसे माँ, छोटी काकी, बुआ, मासी, ताऊ, मामा, फुफा सभी लोग दिखाई देते, पर मझली काकी कहीं नजर नहीं आती! पंडित जी ने जैसे ही कहा, 'विवाह की रस्में शुरु की जाएं!' छवि ने पंडित जी को रोक दिया और कहा, 'एक मिनट पंडित जी!' छवि मंडप से उठ खड़ी हुई और सिमरिया को ढूढंती हुई रसोई घर तक पहुंची! वहां से उसेे खींचकर मंडप तक ले आई! मंडप में बैठे सारे लोग सन्न रह गए! बड़ी काकी ने नजरें तरेरी और कहा, 'इस अपशगुनी को यहां क्यूं लाई है?' छवि ने प्रति उत्तर में कहा, 'काकी, ये ही मेरे ब्याह का पहला शगुन करेंगी, वरना मैं ये शादी नहीं करूंगी!' शादी की सभी रस्में सिमरिया की मौजूदगी में हुई! छवि मंडप से मझली काकी को देख मुस्कुराती और सिमरिया इतना सम्मान और प्यार पाकर अभिभूत हो उठती!
4.
हाँ, प्यार किया था उसने!!!
वो आजकल बुझा बुझा सा रहता था! खिड़की पर बैठे बैठे वो सारी कायनात की झलकियां देखता! प्रेमी जोड़ो को देख वो व्याकुल हो उठता! पूरे मोहल्ले और क्लास की जान था वो! बेखौफ, बेबाक और हरफनमौला! पर उसे इश्क जैसा रोग हो गया था! ऐसा रोग, जिसका घाव जितना पुराना होता है, आशिक उतना ही आवारा होता चला जाता है! गुस्ताख को गुस्ताखियां पसंद थी, पर इश्क करने की गुस्ताखी शायद उसने पहली और आखिरी बार की थी! वो गुस्ताख था, उसका दिल भी गुस्ताख था! बड़ी शिद्दत से उसने प्यार किया था! पर वो लड़की...उसे भुलाना नामुमकिन था! प्यार की खातिर उसने अपने आप को खो दिया था! उस मस्तमौला शख्सियत की मस्ती, मौला ने छीन ली थी! वो आज भी उसे याद करता है! कार एक्सीडेंट में गुस्ताख तो बच गया, पर उसका गुस्ताख दिल लेकर वो खुदा के पास चली गई! वील चेयर पर बैठे बैठे वो अपने अतीत में छांक रहा था! कभी नर्स में, तो कभी रिशेप्सनिस्ट में, उसे वो नजर आती थी! आज गुस्ताख का जन्मदिन था! मनोज, नमिता, प्रिती, वनिता, विनोद, कुशाल, रिकीं, विनय, पंकज, अनीता सारे के सारे केक लेकर हॉस्पिटल आए थे! दोस्तो को देखकर वो बहुत खुश हुआ, पर उसकी निगाहें अब भी अपनी गुस्ताखी को ढ़ूढ रही थी! उसने विनय से इशारों में कुछ पूछा! विनय के आंसू झलक पड़े! उसने खुद को संभालते हुए गुस्ताख से कहा, 'साले, अब तो भूल जा उसे! तूने उसे खो दिया है, पर हम तुझे खोना नहीं चाहते! अब रूलाएगा क्या?' सारे के सारे गुस्ताख को गले लगाकर रो पड़े!
वो आजकल बुझा बुझा सा रहता था! खिड़की पर बैठे बैठे वो सारी कायनात की झलकियां देखता! प्रेमी जोड़ो को देख वो व्याकुल हो उठता! पूरे मोहल्ले और क्लास की जान था वो! बेखौफ, बेबाक और हरफनमौला! पर उसे इश्क जैसा रोग हो गया था! ऐसा रोग, जिसका घाव जितना पुराना होता है, आशिक उतना ही आवारा होता चला जाता है! गुस्ताख को गुस्ताखियां पसंद थी, पर इश्क करने की गुस्ताखी शायद उसने पहली और आखिरी बार की थी! वो गुस्ताख था, उसका दिल भी गुस्ताख था! बड़ी शिद्दत से उसने प्यार किया था! पर वो लड़की...उसे भुलाना नामुमकिन था! प्यार की खातिर उसने अपने आप को खो दिया था! उस मस्तमौला शख्सियत की मस्ती, मौला ने छीन ली थी! वो आज भी उसे याद करता है! कार एक्सीडेंट में गुस्ताख तो बच गया, पर उसका गुस्ताख दिल लेकर वो खुदा के पास चली गई! वील चेयर पर बैठे बैठे वो अपने अतीत में छांक रहा था! कभी नर्स में, तो कभी रिशेप्सनिस्ट में, उसे वो नजर आती थी! आज गुस्ताख का जन्मदिन था! मनोज, नमिता, प्रिती, वनिता, विनोद, कुशाल, रिकीं, विनय, पंकज, अनीता सारे के सारे केक लेकर हॉस्पिटल आए थे! दोस्तो को देखकर वो बहुत खुश हुआ, पर उसकी निगाहें अब भी अपनी गुस्ताखी को ढ़ूढ रही थी! उसने विनय से इशारों में कुछ पूछा! विनय के आंसू झलक पड़े! उसने खुद को संभालते हुए गुस्ताख से कहा, 'साले, अब तो भूल जा उसे! तूने उसे खो दिया है, पर हम तुझे खोना नहीं चाहते! अब रूलाएगा क्या?' सारे के सारे गुस्ताख को गले लगाकर रो पड़े!
5.
'कितनी अजीब बात है ना श्याम! मजदूर फ्लैट्स बनाते है, पर उनमें रह नहीं सकते! दर्जी एक से एक डिजाईनर कपड़े सिलता है, पर उसके बच्चे, चिन्दी से बने कपड़े पहनते है! मेट्रो और मोनोरेल भी इन्ही मजदूरों की देन है, पर कोई भी मजदूर उसमें सफर नहीं करता है, और यहाँ तक की सरकार भी उऩके लिए कुछ नहीं करती!' श्याम मुस्कुराया और बोला, 'रेनू बात तो तुम ठीक ही कहती हो! अब देखो ना हमारे केस में...मेरे दिल में जगह तुमने भी बनाई है, पर तुम वहाँ रह नहीं सकती! तुम इत्ती सी जगह में कहां समा पाओगी, और यहां तक की ये सरकार भी तो कुछ नहीं करती ना' रेनू ने श्याम की तरफ देखा औऱ दोनों ठहाके लगाते हुए अपना डिनर पूरा करने लगे!

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