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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Sunday, 13 April 2014

मेरी लिखीं लघुकथाएँ !!!

6.
रविवार की वो अलसाई सुबह है | उस पर उसके हाथों की बनी गरमा गरम कॉफी | बरामदे में बैठ कर उसके साथ घंटों बातें करना | रविवार कैसे बीत जाता था, पता ही नहीं चलता था | रितेश आज भी उसे इतना ही याद करता था | उसकी तस्वीर की तरफ देखकर बोला, 'देखो ना, आज भी रविवार है | आज की सुबह भी उतनी ही अलसाई है, जितनी तब हुआ करती थी | कॉफी की गरमाहट भी जस की तस ही है | बरामदा आज भी उसी मुद्रा में है | कुछ नहीं है, तो वो हो बस तुम...! बाकि सब तो है ही | अब तो मैं भी नहीं ही हूं, तुम्हारे जाने के बाद भीतर ही भीतर खोखला सा हो गया हूं | इस तस्वीर से बाहर निकल आओ, मुझे तुम्हारे साथ कॉफी पीनी है | इस बरामदे का सुनापन हमारी बातों से कम करना है | तुम लौट आओ ना...बहुत स्वार्थी निकली तुम तो !!! बड़ी बड़ी कस्में खाई थी ना तुमने कि हमेशा साथ रहूंगी| अब मुझे बीच मझधार में यूं अकेला छोड़ चली गई | कभी माफ नहीं करूंगा तुम्हे....कभी नहीं!" रितेश के आंखों से एकाएक आंसू बिखरने लगे और कॉफी का प्याला हाथ से छूट जमीन पर गिर पड़ा |


7. 
चारों ओर कोहराम मचा था| लोग बाग अपने परिजनों को ढुंढ रहे थे| मौत का नंगा नाच अभी अभी थमा था| सड़को पर खून से लथपथ कपड़े, पैरों से रौंदी हुई लाशें, टूटी चप्पलें, फुटे चश्में, बर्तन, टूटी चूडियां, खिलौने....और इन्हीं के बीच, उसे मिला वो दुप्पटा !!! वही पिला दुप्पटा जो सबा ने आखिरी बार ओढ़ रखा था| दिल धक्क से रह गया उसका, पिला दुप्पटा देखकर| उस दुप्पटे के छोर को पकड़ते हुए वो एक शरीर की तरफ बढ़ा| दिल में भूकंप मचा था और हाथ उस शरीर को छुने से कतरा रहे थे| एक हाथ उसने अपने कलेजे पर रखा और दूसरा हाथ उस शरीर की तरफ बढ़ाते हुए वो आगे बढ़ा| फिर धीमे से उस शरीर को उसने अपनी ओर मोड़ा| और उसके दिल का भूकंप तुरंत पानी की तरह बह गया | वो सबा नहीं थी| दुप्पटे को हाथ में थामें, वो वही एक कोने में हताश होकर बैठ गया|


8. 
दो राजनेताओ के बच्चे आपस में झगड़ रहे थे !
- ओये खुद को समझती क्या हो?
- कुछ नहीं !
- फिर इतना रूठती क्यों हो?
- पता नहीं !
- तो फिर आडवाणी की तरह 72 घंटे में मान क्यूँ जाती हो?
- हुंह !!!
- अच्छा अब राहुल की तरह सहजादी मत बनो, यहां आओ !
- तुम भी राखी सावंत की तरह मिर्ची मत लगाओ !
- अच्छा, तो अब मुझमे तुम्हे राखी नज़र आती है?
- AK 49 तो तुम हो नहीं !
- सड़े टमाटर और अंडे खाने का कोई शौक नहीं मुझे !
- अच्छा, तो फिर क्या शौक है? नगमा की रैली में जाने का !!
- ना बाबा, मुझे तो सैफई जाना है! सब चीज़ की आज़ादी है वहां!
- ठीक है जाओ !!
- अरे, तुम फिर रूठ गई !
- हाँ रूठ गई हूँ, और वो भी जसवंत सिंह स्टाइल में...अबकी नहीं मानूंगी ! हुँह बाय !!!
- ठीक है जाओ, तुम भी एक दिन पासवान की तरह वापस जरूर लौट आओगी !



9. 
राधा आंटी को पिछले तीन वर्षो से जानती हूँ। आज पहली बार उनके के घर आई थी। उनके ७ साल के बेटे अरनव की बर्थडे पार्टी थी। गुब्बारे, रंग-बिरंगी टोपियाँ, खिलौने और ढेर सारे प्यारे प्यारे बच्चे। अद्भुत सा माहौल था वहां। राधा आंटी के सारे रिश्तेदारों का हुजूम भी मौजूद था वहां। मैं भी चुपचाप उन्ही के बीच जाकर बैठ गई। मैंने राधा आंटी के बेटे अरनव को पास बुलाया और हाथ में गिफ्ट थमाते हुए, अपने बगल में बैठी उसकी दूर की मासी की तरफ इशारा करते हुए पूछा, 'बेटा, ये कौन है ?' अरनव ने मासी को ध्यान देखा और कहा, 'मुझे तो पता नहीं, ये आंटी कौन है।' अरनव ने जवाब में कहा। अरनव के साथ उसी के उम्र का एक और क्यूट सा बच्चा खड़ा था, मैंने इस बार उसकी तरफ इशारा करते हुए पूछा, 'अच्छा अरनव ये बताओ, ये जो तुम्हारे साथ खड़ा है, वो कौन है?' अरनव मुस्कुराया और उस बच्चे का हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोला, 'ये.....! ये तो मेरा दोस्त है, पक्कवाला और बेस्टवाला फ्रेंड !!' अरनव की बात सुनकर ऐसा लगा मानो बच्चे भी समझते हो, आखिर दोस्त क्या होते है। अरनव की इस प्यारी सी बात को सुनकर सभी के चेहरों पर मुस्कान छा गई।


10. 
नीरा फटाफट तैयार होकर चप्पल पहनने के लिए दरवाजे की तरफ लपकी | बाल यूं ही बिखरे हुए थे | धोने के बाद उन्हें सवांरने की फुर्सत तक न थी उसे | दरवाजे पर खड़े खड़े एक नजर पैर पर मारती ताकि चप्पल सही पैरों में पहन सके, और दूसरी नजर अपने फोन पर आए ढेर सारे कॉल्स और मैसेजेस पर | अंदर से पापा की आवाज आई, 'लाईट का बिल भर दिया है ना बेटा?' नीरा ने हड़बड़ी में कहा, 'हां, पापा भर दिया!' वो दरवाजा खोलकर लिफ्ट की तरफ बढ़ी, तो छोटे भाई की आवाज आई, 'मेरे नेट का रिर्चाज करवा दिया है ना दी?' नीरा लिफ्ट का बटन दबाते हुए बोली, 'हां, बाबा इट्स डन!' लिफ्ट उसके फ्लोर पर आई | वो फटाफट अंदर चढ़ी | लिफ्ट में उसे शर्मा आंटी मिल गई | उन्होनें पूछा, 'अरे बेटा सोसायटी मिटींग का लेटर तो बना दिया है ना?' '
'हां आंटी, सब रेडी है!' नीरा ने कहा | इतने में लिफ्ट नीचे आकर रूकी, नीरा लिफ्ट से बाहर निकलीं | वो बस बिल्डिंग से बाहर निकलने ही वाली थी, इतने में माँ पीछे से भागती हुई आई | नीरा ने मां को देखते हुए कहा 'अब क्या हुआ मां, मैनें राशन का हिसाब किताब टेबल पर ही रख दिया है'| मां मुस्कुराई और नीरा के हाथ में खाने का डब्बा थमाते हुए बोली, 'सबका ख्याल रखती है तू, खुद का कब रखेगी?' नीरा मुस्कुराई, और मां को जादू की झप्पी देते हुए बोली, 'तुम हो ना मां, मेरा ख्याल रखने के लिए!'
नीरा ने झटपट मां से विदा लिया और रिक्शें में बैठ गई.... मां उसे तब तक निहारती रही, जब तक रिक्शा उनकी आंखों से ओझल नहीं हो गई | वापस बिल्डिंग की तरफ मुड़ते हुए मां ने मुस्कुरा कर कहा, 'मेरी लाडो......'

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