कल घर पहुँचते ही माँ ने पूछ लिया कि आज नानाजी को फोन किया था तुने? मैं डर गयी, अचानक नानाजी को फोन करने की क्या आफद आन पड़ी! जब भी हमारे बुजुर्गो को फोन करने की नौबत आती है, तो हमें लगता है, कुछ तो गड़बड़ है! कही उन्हें कुछ हुआ तो नहीं? क्या वो फिरसे बीमार है? क्या हुआ? कब? कैसे? किसी ने मुझे क्यों नहीं बताया? अरे मैं उनकी कुछ नही लगती क्या?
हाय ये पत्रकार मन!!!
'क' कारों (कौन, कब, कैसे, कहाँ, क्या) से भर उठा! मैंने जिज्ञासावश पूछा, ' माँ, नानाजी ठीक है न?"
माँ ने फटकारते हुए कहा, 'अरे पगली, उन्हें कुछ नहीं हुआ है! आज तो उनका जन्मदिन है, तूने उन्हें विश किया की नहीं बस इतनी सी बात जाननी थी?
मैं इस विश का विष निगलते हुए माँ से बोली, 'तुम भी ना, खामखा डरा दिया!!
खैर जैसे तैसे फोन उठाया और नानाजी को फोन घुमाया! फोन की घंटिया लगातार जा रही थी, पर सामने कोई फोन ही नहीं उठा रहा था!
हाय ये पापी मन!!
फिर सोचने लगा, नानाजी को कुछ हुआ तो नहीं? क्या वो ठीक है?
माँ की तरफ देखा, तो वो मुझपे ही टकटकी लगा के बैठी थी! ऐसा लग रहा था, मानो मैं ही हूँ वो बदनसीब जो उसे कोई बुरी खबर दूंगी! माँ इशारो में मुझसे पूछ रही थी, क्या हुआ? लगा क्या? अरे नामुराद, बोलती क्यूँ नहीं ?
मैंने फोन काटा और दुबारा लगाया! इस बार भी कोई नहीं उठा रहा था! मैं सोच रही थी, अभी तो केवल ९ ही बजे है! इस वक़्त तो सारे खाना खाते है फिर आज? आज क्यों नहीं है कोई? कहा मर गए सारे ममेरे भाई बहन? कम्बख्त फोन क्यों नहीं उठाते?
मन ही मन सारे भाई बहनों को खूब खरी खोटी सुना दी! पर माँ, उसका क्या करूँ? क्या जवाब दूँ? बड़ी जिद्दी है माँ, मुझपर ही गयी है ना! मेरा मतलब है, मैं उसी पर गई हूँ! हम दोनों ज़िद्दी है! ना वो मानने वाली थी न मैं!
ये तीसरी बार था, जब मैंने कॉल रीडायल किया! ७ घंटियों के बाद आखिरकार किसी ने फोन उठा ही लिया! पर ये नेटवर्क! उफ्फ!! कॉल डिसकनेक्ट !!! फिर कोशिश करती इसके पहले ही मेरे मोबाइल पर इनकमिंग नंबर फ़्लैश हुआ! और नाम था, " नानाजी "!!! उत्सुकतावश फोन उठाया और भीतर ही भीतर भगवान से विनती की! भगवान्, अगली आवाज़ नानाजी की ही हो!
धीमे से "हलो" की आवाज़ आयी! मेरे मन में पटाखे फूटने लगे, मन चकरी की तरह गोल गोल घूमने लगा! ये आवाज़ नानाजी की ही थी! माँ को मेरी मुस्कराहट से ही अंदाजा हो गया था, कि दूसरी ओर नानाजी ही है!
"नानाजी प्रणाम, और जन्मदिन की ढेर सारी बधाई!!! " खिलखिलाते हुए मैंने उनसे कहा! वो बोले, 'खुश रहो, अरे अब काहे का जन्मदिन, हम तो बूढे हो चले, ८५ की उमर हो गई! ऐसे अच्छा थोड़े ही लगता है!'
उनकी आवाज़ से मैं भाँप गई कि वो सो रहे थे, और मैंने खामखा उन्हें डिस्टर्ब किया! मैंने कहा, ' नानाजी आप सो जाइये रात बहुत हो गई है! हम कल बात करते है!' और कॉल डिसकनेक्ट किया! मुड़कर देखा तो माँ के चेहरे पे एक सुकून था और मेरे चेहरे पर मुस्कराहट!!!
हाय ये पत्रकार मन!!!
'क' कारों (कौन, कब, कैसे, कहाँ, क्या) से भर उठा! मैंने जिज्ञासावश पूछा, ' माँ, नानाजी ठीक है न?"
माँ ने फटकारते हुए कहा, 'अरे पगली, उन्हें कुछ नहीं हुआ है! आज तो उनका जन्मदिन है, तूने उन्हें विश किया की नहीं बस इतनी सी बात जाननी थी?
मैं इस विश का विष निगलते हुए माँ से बोली, 'तुम भी ना, खामखा डरा दिया!!
खैर जैसे तैसे फोन उठाया और नानाजी को फोन घुमाया! फोन की घंटिया लगातार जा रही थी, पर सामने कोई फोन ही नहीं उठा रहा था!
हाय ये पापी मन!!
फिर सोचने लगा, नानाजी को कुछ हुआ तो नहीं? क्या वो ठीक है?
माँ की तरफ देखा, तो वो मुझपे ही टकटकी लगा के बैठी थी! ऐसा लग रहा था, मानो मैं ही हूँ वो बदनसीब जो उसे कोई बुरी खबर दूंगी! माँ इशारो में मुझसे पूछ रही थी, क्या हुआ? लगा क्या? अरे नामुराद, बोलती क्यूँ नहीं ?
मैंने फोन काटा और दुबारा लगाया! इस बार भी कोई नहीं उठा रहा था! मैं सोच रही थी, अभी तो केवल ९ ही बजे है! इस वक़्त तो सारे खाना खाते है फिर आज? आज क्यों नहीं है कोई? कहा मर गए सारे ममेरे भाई बहन? कम्बख्त फोन क्यों नहीं उठाते?
मन ही मन सारे भाई बहनों को खूब खरी खोटी सुना दी! पर माँ, उसका क्या करूँ? क्या जवाब दूँ? बड़ी जिद्दी है माँ, मुझपर ही गयी है ना! मेरा मतलब है, मैं उसी पर गई हूँ! हम दोनों ज़िद्दी है! ना वो मानने वाली थी न मैं!
ये तीसरी बार था, जब मैंने कॉल रीडायल किया! ७ घंटियों के बाद आखिरकार किसी ने फोन उठा ही लिया! पर ये नेटवर्क! उफ्फ!! कॉल डिसकनेक्ट !!! फिर कोशिश करती इसके पहले ही मेरे मोबाइल पर इनकमिंग नंबर फ़्लैश हुआ! और नाम था, " नानाजी "!!! उत्सुकतावश फोन उठाया और भीतर ही भीतर भगवान से विनती की! भगवान्, अगली आवाज़ नानाजी की ही हो!
धीमे से "हलो" की आवाज़ आयी! मेरे मन में पटाखे फूटने लगे, मन चकरी की तरह गोल गोल घूमने लगा! ये आवाज़ नानाजी की ही थी! माँ को मेरी मुस्कराहट से ही अंदाजा हो गया था, कि दूसरी ओर नानाजी ही है!
"नानाजी प्रणाम, और जन्मदिन की ढेर सारी बधाई!!! " खिलखिलाते हुए मैंने उनसे कहा! वो बोले, 'खुश रहो, अरे अब काहे का जन्मदिन, हम तो बूढे हो चले, ८५ की उमर हो गई! ऐसे अच्छा थोड़े ही लगता है!'
उनकी आवाज़ से मैं भाँप गई कि वो सो रहे थे, और मैंने खामखा उन्हें डिस्टर्ब किया! मैंने कहा, ' नानाजी आप सो जाइये रात बहुत हो गई है! हम कल बात करते है!' और कॉल डिसकनेक्ट किया! मुड़कर देखा तो माँ के चेहरे पे एक सुकून था और मेरे चेहरे पर मुस्कराहट!!!

No comments:
Post a Comment