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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Monday, 10 February 2014

इशक तेरा !!!

मीरा रोज़ की ही तरह आज भी अपनी ठेलागाड़ी लेकर पुराने मोहल्ले सामान बेचने निकली थी! आज उसने दॄढ़ निश्चय किया था की साहब को सब बता दूंगी! मैं उनसे प्यार करती हूँ, और ये रोज़ रोज़ के चोरी छुपे से अब काम नहीं चलेगा! बालकनी से ताक झाँक अब बहुत हुआ! उन्हें मुझे पूरी तरह अपनाना होगा! वो जैसे ही मोहल्ले के भीतर दाखिल हुई! तो उसने देखा कि मोहल्ले वाले साहब को घेरे खड़े है! मिसेस वर्मा साहब से कह रही थी, "अपना स्टेटस मत भूलों तुम! कहाँ तुम और कहाँ वो!" फिर शर्माजी बोले, "ये छोटे लोग तो होते ही ऐसे है, पर तुम इतने पढ़े लिखे हो! इस कदर एक ठेलेवाली के साथ तुम्हारा रिश्ता जोड़ना शोभा नहीं देता"! मीरा का दिल ये सब बातें सुनकर टुकड़ो में विभाजित हो चूका था, वह ये सब सुनकर वहाँ से लौट ही रही थी, कि इतने में किसी ने उसके कंधो पर हाथ रखा! मुडक़र देखा तो साहब थे! साहब ने कहा, " रुको मीरा! ये लोग तुम्हे छोटा कह रहे है! पर मुझे तो इनकी सोच छोटी लगती है! जिस लड़की के हाथो का सामान वो अपने घरों में सजा सकते है! उस लड़की को अपने घर का श्रृंगार बनाने में क्या हर्ज़! चलो यहाँ से !!!


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