About Me

My photo
नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Sunday, 1 December 2013

मम्मी की मम्मी.....

मेरी नानी माँ। प्यारी नानी माँ। नानी तो सभी की होती है, पर मेरी नानी जैसी कोई नहीं। नानी माँ के सात बच्चे।  जिसमे मेरी माँ छठे नंबर पर। चार मौसियों और दो मामा के साथ पुरे सात लोगो की जमात। नानी माँ के बारे में क्या कहूं ? किसी के भी सामने जब उनकी बात होती है, तो लोग बस यही कहते है, " बहुत निक छथिन" अथार्त वो बहुत अच्छी है।

नानी माँ नानाजी के साथ बिहार के सीतामढ़ी जिले में शहर के बीचोबीच पिछले पैतीस वर्षो से रह रही है।  दूर दराज से कोई भी रिश्तेदार जब भी सीतामढ़ी आता है, तब नानी माँ के यहाँ ही ठहरता है! उनके फ्री में खाने और सोने का बंदोबस्त जो हो जाता है। नानी माँ की अब ८५ वर्ष हो चुकी है।  लेकिन अब भी वो अपने हाथो से खाना बना कर सभी को खिलाती है! और खाना कैसा बना है? तब तक पूछती रहती है, जब तक हमारे सामने की थाली खत्म न हो जाए।  

नानी माँ अपने मायके में राजदुलारी थी। पूरे खानदान भर में वो अकेली बेटी थी, इसलिए नाजो से पली थी।परन्तु नानाजी के यहाँ आने के बाद, उन्होंने जो बुरे दिन देखे, उनका उन्हें कोई मलाल नहीं। बस कहती है, " सब किस्मत का खेल है, पल में राजा पल में रंक"।  नानीजी की काया अब उनका साथ नहीं देती। लेकिन जितने भी मेहमान आये, नानीजी सभी को अपने हाथो से बनाकर खिलाती है। उन्हें चटपटा भोजन बहुत पसंद है, लेकिन नानाजी को चटपटी चीज़े हजम नहीं होती, जिसके कारण रोज़ दोनों में अनबन होती रहती है। नानीजी के दाँतो की संख्या भी अब कम होती जा रही है, लेकिन कड़क से कड़क चीज़ खा लेती है। उम्र के इस पड़ाव पर आने के बाद भी नानीजी चट से सुई में धागा लगा लेती है। 

नानीजी के ही कारण अब भी गाँव जाने का मन करता है।  उनके हाथो से बनी आलू कढ़ी मुझे बेहद पसंद है।
उनका दुलारना, प्यार करना और हमारी ज़रा सी गलती होने पर मेरी माँ को डांट लगाना, (कि अपनी बेटियों को कुछ नहीं सिखाया, इन्हे पूरी तरह बंबइया बना दिया है।) बहुत अच्छा लगता है।       

नानी माँ के पास सभी के राज़ सुरक्षित है। नानी माँ ऊँचा सुनती है।  जिसकी वजह से हमें भी ज़ोर ज़ोर से बात करनी पड़ती है! पर नानीजी लोगो के लबो की बुदबुदाहट समझ सकती है! एक बार दूर दराज से कोई मामी जी आयी थी, उन्हें ये लगा की नानीजी ऊँचा सुनती है, तो अगर वो कुछ भी धीरे से कहेंगी, तो वो सुन नहीं पाएंगी! परन्तु नानीजी बड़ी चालक है, उन्होंने शब्दो को पकड़ा और सारी बातें सुन ली! फिर क्या था, घर में कोहराम मच गया! और आखिरकार मामीजी को माफ़ी मांगनी ही पड़ी!

नानीजी की एक और कला है, जिसमे उन्होंने में पी. एच. डी. कर रखी है! और वो कला है, " रूठने की" !!!!!
अगर नानीजी रूठ गयी, फिर चाहे आंधी आये या तूफ़ान वो भोजन ग्रहण नहीं करती! तब तक जब उनका पारा पूरी तरह ना उतर जाए! घर के बुजुर्ग से लेकर छोटे बच्चे तक, हर समय उन्हें बनाने और खिलाने की होड़ में शामिल हो जाते है ! और जिसकी बात मानकर उन्होंने खा लिया, समझो उस दिन वह व्यक्ति घर का " हीरो " बन गया !

फिर भी " माय नानी इज वर्ल्डस बेस्ट नानी"

नानीमाँ की याद में गुणशेखर जी की कुछ पंक्तियाँ याद आती है!   

मेरी मम्मी की, मम्मी की 
है कुछ अजब कहानी 
किसी बात पर चिढ़ जाएं ,
तो,याद करा दें नानी।
मेरी प्यारी-प्यारी नानी।
कभी लगें कविता की धारा 
लगतीं कभी कहानी।  
कभी-कभी चुटकुले सरीखी 
फूटे मधुरिम बानी।
मेरी प्यारी-प्यारी नानी।

No comments: