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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Monday, 2 September 2013

हैट्स ऑफ जेंटलमैन....

कल ऑफिस से घर के लिए जाते हुए कुछ ऐसी घटना हुई, जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया की, आज भी दुनिया में इंसानियत मौजूद है! कल तक़रीबन शाम छह बजे, मैं ऑफिस से निकलकर घर के लिए निकली! मुझे स्टेशन पहुचने के लिए रिक्शा करनी पड़ती है! और छह बजे ऐसा समय होता है, जब सारे ऑफिस के लोग एक साथ छुटते है! लोगो में रिक्शा और बस पकड़ने की होड़ मची रहती है! सभी अपने अपने जुगाड़ में लगे होते है! उनका बस एक ही मकसद होता है! किसी तरह जल्दी स्टेशन पहुच जाए, ताकि उनकी निर्धारित ट्रेन कही छुट न जाए! उस वक्त कोई किसी की नहीं सोचता, बस अपनी अपनी सवारी पर ध्यान देते है! हम सब रिक्शा स्टैंड पर खड़े रिक्शा का इंतज़ार कर रहे थे, एक तो मुंबई के रिक्शा वालो का क्या कहना, वो तो अपने बगल से जाते हुए बी ऍम डब्लू कार वाले को भी झिडक देते है! मानो सारा शहर उन्ही का हो!तक़रीबन दस मिनट तक इंतज़ार करते हुए एक रिक्शा आयी! सभी लोग कुछ यूँ भागे जैसे कोई भूखा बच्चा खाने पर झपटता है! हम भी तेजी से भागे, पर हमारा भागना व्यर्थ गया, क्यूंकि एक लड़के ने हमसे पहले ही रिक्शे वाले को पूछ लिया और रिक्शे वाले ने भी हामी भर दी थी! वो लड़का तक़रीबन चौबीस या पच्चीस वर्ष का होगा! जेल लगे हुए सीधे और कड़क बाल, हील्स वाले जूते, पीठ पर एक भरी बैग जिसमे शायद लैपटॉप था, फॉर्मल कपडे और आँखों पर चश्मा! ये सब बयान कर रहे थे, की वह भी किसी ऑफिस में से अपनी पुरे दिन की मेहनत कर के आ रहा है! जब रिक्शे वाले ने हां कहा, तो मानो उसकी लाटरी लग गयी हो! मुस्कुराता हुआ, वो अन्दर बैठ गया और हम फिर पीछे आकर रिक्शा स्टैंड पर खड़े हो गए, दुबारा अपनी किस्मत आजमाने! पर जैसे ही रिक्शा थोड़ी दूरी पर गयी, हमने देखा की वो उतर रहा था, मैंने सोचा जब इसे जाना ही नहीं था, तो रिक्शे में बैठा ही क्यों? पर तुरंत मेरी ये धारणा बदल गयी, मुझे देख कर आश्चर्य हुआ, की वो अपनी रिक्शा छोड़कर, एक अपंग व्यक्ति की मदद कर रहा था, उसे उसी रिक्शा में बैठाने की कोशिश कर रहा था! उसे उस अपंग व्यक्ति को बैठाने में पुरे पांच मिनट लगे, पर उसने उन्हें अच्छी तरह बिठाया और वापस आकर बस स्टैंड पर खड़ा हो गया! मैं तो सोचने लगी, की इस मतलबी दुनिया में कोई किसी की मदद नहीं करता! ये भी तो पूरा दिन तक हार कर अपने घर जा रहा था, फिर इसने क्यूँ मदद की! बस सोच रही थी, कह दू उससे " वेल डन", पर कह ना सकी, अगली रिक्शा आई और मैं उसमे बैठ कर चली आई! पता नहीं वो कौन था, कहा से था, पर उसने जो किया शायद मैं भी अगली बार से ऐसा ही करुँगी! ये ब्लॉग उसे थैंक्स कहने के लिए लिखा है, जिसने हमें इस मतलबी दुनिया में थोड़ी सी मदद करने की प्रेरणा दी है!

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