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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Friday, 2 August 2013

ये बेटियाँ…

एक कहानी पढ़ी थी बचपन में.…आज के माहौल को देख कर याद आ गई ! दो सहेलियाँ थी एक का नाम सीमा था और एक का गुड्डी ! सीमा के माँ बाप उसे स्कूल भेजते थे, और गुड्डी अपने पिता के  साथ उनके खेत में हाथ बटाती थी ! गुड्डी के ४ भाई थे मगर सब छोटे थे, इसलिए गुड्डी को पिताजी की सहायता करनी पड़ती थी ! सीमा माँ बाप की अकेली संतान थी इसलिए उसे पूरी छूट थी पढने की ! गुड्डी का भी बड़ा मन करता था, पढने का...

जब भी वो सीमा को स्कूल जाते देखा करती थी उसे बड़ा महसूस होता था, की उसे भी पढना चाहिए ! और सीमा जब भी स्कूल जाते वक़्त गुड्डी को देखती तो यही सोचती थी की काश मुझे भी नहीं पढना पड़ता और मैं भी गुड्डी की तरह खेतो में काम करती ! वक़्त बिता १० साल हो गए.…सीमा पत्रकार बन कर अपने गाँव वापस लौटी !

वो सभी से मिली और अंत में गुड्डी के भी घर गयी ! उसने जो हालात देखे वो बयान करने लायक नहीं थे! गुड्डी के पिताजी का निधन हो चुका था ! और माँ को लकवा मारा था ! चारो भाइयों में से एक का भी अता-पता नहीं था ! 

सीमा गुड्डी से मिली और सारा हाल पूछा! तब गुड्डी ने बताया की उसकी शादी के बाद पिताजी ने सारी सम्पति लगा कर चारो बेटो को पढाया और चारो बेटे अपने बीवी-बच्चो के साथ अकेले रहने चले गए हैं ! उन्हें यहाँ गाँव में परेशानी होती है…. गुड्डी ने कहा शादी के पहले भी मैंने माँ-बाप की बहुत सेवा की थी और अब इस हालत में उन्हें नहीं देख सकती ! कई बार माँ से कहा की चलो हमारे साथ पर कहती है नहीं मैं यही रहूंगी ! इसलिए मैंने अपनी बेटी गुडिया को यहाँ छोड़ रखा है ताकि माँ की देखभाल हो सके…. सीमा सोचने पर मजबूर थी की गुड्डी ने शुरू से ही अपने माँ-बाप का साथ निभाया उन्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा ! और चार बेटो को लेकर भी गुड्डी की माँ क्या करती, जब उन्हें कोई देखता ही नहीं था…. आज भी यही तो होता है 

लोग बेटे के लिए मरते है और जब वही बेटा बड़ा होकर उन्हें तकलीफ देता है तो उनके आंसू नहीं थमते ….आज भी हमारे समाज में लडकियों को लडको से कम समझा जाता है ! खैर लोगो की सोच तो नहीं बदल सकते है पर हम अपनी सोच कर बदल कर नयी क्रांति ला सकते है !

लेखक 

एक बेटी…. 

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