पता है जब कभी खबर सुनती हूँ कि दुनिया के किसी अन्य कोने में कोई आतंकवादी हमला हुआ है, तब मैं सच में सहम जाती हूँ। वैसे तो एक पत्रकार होने के नाते मुझे डरने और घबराने का कोई हक़ नहीं, लेकिन पत्रकार होने के साथ साथ मैं एक इंसान भी हूँ और सहम इसलिए जाती हूँ क्यूंकि मुझे मरनेवालों से ज्यादा उस आतंकवादी का ख्याल आता है, जो दूसरों की ज़िन्दगी के साथ साथ अपनी ज़िन्दगी भी तबाह कर देता है। कभी कभी बड़ी गहराई से सोचती हूँ कि आखिर क्यूँ कोई 24-25 वर्षीय नौजवान अचानक आतंकवादी बन जाता है। आखिर उसकी ऐसी क्या मज़बूरी रही होगी कि हाथ में बंदूक और सिर पर कफ़न बांधे ये मौत को हंसी ख़ुशी गले लगा लेता है !
पहले तो ऐसा लगता था कि लोगो में शिक्षा का अभाव है और इसी कारणवश ये लोग आतंक की राह पर चल पड़ते है। लेकिन अब.....! अब तो पढ़े-लिखे, अच्छे घरों के, अच्छी डिग्री के साथ, अच्छा पैसा कमाने वाले नौजवान भी इस राह को अपनाने लगे है। आतंकवादी बनने लगे है। आतंकवादी हमले के बाद क्या होता है, ये हम सब जानते है। लेकिन इस हमले से पहले आखिर किस तरह की तैयारी की जाती होगी? कैसे एक लड़का, जिसका एक परिवार होगा। कुछ दोस्त होंगे। गलफ्रेंड होगी। एक अच्छी नौकरी होगी। निश्चित दिनचर्या होगी। ज़िन्दगी जीने के पीछे एक मकसद होगा। अचानक से उसके लिए सारी परिभाषाएँ बदल जाती है। उसके लिए जीवन का मकसद ही बदल जाता है।
सोचिये जरा....! जब स्कूल में उस आतंकवादी को जिस टीचर ने पढ़ाया होगा, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिसे वो ज्ञान और जीवन में आगे बढ़ने की कला सिखा रही है वो एक दिन बड़ा होकर इसी ज्ञान के सहारे जीवन जीने की कला नहीं सीखेगा बल्कि कइयों की जीवन लीला समाप्त कर देगा। उस टीचर ने कभी ये उम्मीद की होगी कि बड़ा होकर उसका छात्र एक काबिल नौजवान बनेगा और कुछ करें ना करे, कम से कम अपना और अपने परिवार का पेट तो जरूर पाल लेगा।
आतंकवादी बनने से पहले जिस गली- मोहल्ले में वो रहता होगा। जहां के बच्चे उस नौजवान में अपना भविष्य देखते होंगे, सोचिये क्या बीतती होगी उन बच्चों पर, जब उनके आईडियल फलां फलां भैया अचानक टीवी पर दिखने लगे और वो भी हाथ में बड़ी बड़ी बन्दूको के साथ। टीवी पर एंकर चीख चीख कर उसे आतंकवादी बता रहा हो। फिर तो मोहल्ले के उस बच्चे को अपने आसपास बड़े हो रहे हर नौजवान में अपना आईडियल नहीं बल्कि एक आतंकवादी नज़र आता होगा।
मुझे नही पता क्यूँ और कैसे कोई आतंकवादी बन जाता है। लेकिन मुझे इतना जरूर पता है कि पहले मज़बूरी में और अब जानबूझकर नौजवान इस अंतहीन गली का रुख कर रहे है। ये आतंकवाद ना जाने कब खत्म होगा? ना जाने कब एक इंसान दूसरे इंसान की जान लेना बंद करेगा। ना जाने कब तक जाति और धर्म के नाम पर आये दिन कत्ले-आम होता रहेगा। इसी के साथ एक गौर करने वाली बात ये भी कि क्या 'आतंकवादी' किसी और दुनिया से आते है?? ध्यान से सोचिये और अपने अंतर्मन से पूछिए, इस सवाल का जवाब आपको स्वयं आपके भीतर मिल जाएगा। फिलहाल आज के लिए इस फितूरी मन से बस इतना ही।
पहले तो ऐसा लगता था कि लोगो में शिक्षा का अभाव है और इसी कारणवश ये लोग आतंक की राह पर चल पड़ते है। लेकिन अब.....! अब तो पढ़े-लिखे, अच्छे घरों के, अच्छी डिग्री के साथ, अच्छा पैसा कमाने वाले नौजवान भी इस राह को अपनाने लगे है। आतंकवादी बनने लगे है। आतंकवादी हमले के बाद क्या होता है, ये हम सब जानते है। लेकिन इस हमले से पहले आखिर किस तरह की तैयारी की जाती होगी? कैसे एक लड़का, जिसका एक परिवार होगा। कुछ दोस्त होंगे। गलफ्रेंड होगी। एक अच्छी नौकरी होगी। निश्चित दिनचर्या होगी। ज़िन्दगी जीने के पीछे एक मकसद होगा। अचानक से उसके लिए सारी परिभाषाएँ बदल जाती है। उसके लिए जीवन का मकसद ही बदल जाता है।
सोचिये जरा....! जब स्कूल में उस आतंकवादी को जिस टीचर ने पढ़ाया होगा, उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिसे वो ज्ञान और जीवन में आगे बढ़ने की कला सिखा रही है वो एक दिन बड़ा होकर इसी ज्ञान के सहारे जीवन जीने की कला नहीं सीखेगा बल्कि कइयों की जीवन लीला समाप्त कर देगा। उस टीचर ने कभी ये उम्मीद की होगी कि बड़ा होकर उसका छात्र एक काबिल नौजवान बनेगा और कुछ करें ना करे, कम से कम अपना और अपने परिवार का पेट तो जरूर पाल लेगा।
आतंकवादी बनने से पहले जिस गली- मोहल्ले में वो रहता होगा। जहां के बच्चे उस नौजवान में अपना भविष्य देखते होंगे, सोचिये क्या बीतती होगी उन बच्चों पर, जब उनके आईडियल फलां फलां भैया अचानक टीवी पर दिखने लगे और वो भी हाथ में बड़ी बड़ी बन्दूको के साथ। टीवी पर एंकर चीख चीख कर उसे आतंकवादी बता रहा हो। फिर तो मोहल्ले के उस बच्चे को अपने आसपास बड़े हो रहे हर नौजवान में अपना आईडियल नहीं बल्कि एक आतंकवादी नज़र आता होगा।
मुझे नही पता क्यूँ और कैसे कोई आतंकवादी बन जाता है। लेकिन मुझे इतना जरूर पता है कि पहले मज़बूरी में और अब जानबूझकर नौजवान इस अंतहीन गली का रुख कर रहे है। ये आतंकवाद ना जाने कब खत्म होगा? ना जाने कब एक इंसान दूसरे इंसान की जान लेना बंद करेगा। ना जाने कब तक जाति और धर्म के नाम पर आये दिन कत्ले-आम होता रहेगा। इसी के साथ एक गौर करने वाली बात ये भी कि क्या 'आतंकवादी' किसी और दुनिया से आते है?? ध्यान से सोचिये और अपने अंतर्मन से पूछिए, इस सवाल का जवाब आपको स्वयं आपके भीतर मिल जाएगा। फिलहाल आज के लिए इस फितूरी मन से बस इतना ही।

1 comment:
Eyeopener....! provoking thoughts...world needs to focus on it now...
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