आजकल जो माहौल है उसे देख कर यही लगता है कि या तो पुरुष जाति नष्ट हो जाए, या फिर विलुप्त ! जहाँ देखो वहां फेमिनिज्म, महिला सशक्तिकरण, महिला मोर्चा, महिलाओ की आज़ादी, महिलाओ का सम्मान, महिलाओ का हक़, महिला.....महिला....और सिर्फ और सिर्फ महिला !
कभी कभी तो ऐसा लगता है कि अगर ये सब रोका ना गया, तो एक दिन ये पुरुष जात डायनासोर की उस विलुप्त प्रजाति जैसा हो जायेगा, जिसे ढूँढना मुश्किल ही नही नामुमकिन होगा। हर तरफ ऐसा विचित्र माहौल देखकर डर लगता है। ऐसा लगता है मानो कही एक दिन सब बदल ना जाए।
ऐसे हालात ना बन जाए कि बाजार में निकले तो सड़क पर हर तरफ महिला ही महिला, कपडो की दुकानों में दाखिल हो तो सिर्फ साड़ी,सलवार-कमीज और महिलाओ के कपडे, सार्वजनिक शौचालयों में पुरुष/महिला की जगह महिला/महिला, दफ्तर में हर तरफ रंग बिरंगी महिला, लेडिफ़ फर्स्ट वाला सिस्टम तो मानो बंद ही हो जायेगा।
महिलाओ को लेकर इतना हाहाकार क्यूँ मचा है, खैर ये तो उन्हें बनाने वाले भगवान को भी नही पता। लेकिन जिस तरह से महिला सशक्तिकरण समाज में हावी हो रहा है, उसे देख के बाईगॉड डर लगता है।
मैं इस बात से बिलकुल इत्तेफ़ाक़ नही रखती कि महिलाये बेचारी, दुर्बल, अबला और लाचार है। महिलाये सबसे सशक्त है, ताकतवर है और उन्हें इस तरह के सशक्तिकरण की कोई आवश्यकता नही है। ये सब एक छलावा है। दुखी ना होकर भी दुखी होने जैसा, गरीब ना होकर दिन दुखियों जैसा।
जहां हक नही है, वहां भी हक़ ! जहां जरुरत नही वहां भी आंदोलन। महिला सशक्तिकरण आज उस जाट आंदोलन जैसा हो गया है, जहाँ सारे अमीर है। सक्षम है। लेकिन दुर्बल होने का ढोंग करने से बाज नही आ रहे।
तो क्या पुरुष जाति के विलुप्त होने का दौर आ गया है ?
खैर, आप सोच रहे होंगे कि एक महिला होकर भी इतना सब कुछ लिखना क्या वाकई अजीब है। तो जनाब, माफ़ कीजियेगा ! लेकिन मैं महिला सशक्तिकरण में बिलीव नही करती। मैं दुर्बल, दीन, दुखी, लाचार, अबला, कमज़ोर और ऐसे ही अजीबोगरीब शब्दों से अपनी ताजपोशी नही करना चाहती।
मेरा हमेशा से मानना है !
महिलाये सक्षम थी.....है.....और रहेंगी। लेकिन लाचारी से नही बल्कि बराबरी से !
तो क्या पुरुष जाति के विलुप्त होने का दौर आ गया है ?
खैर, आप सोच रहे होंगे कि एक महिला होकर भी इतना सब कुछ लिखना क्या वाकई अजीब है। तो जनाब, माफ़ कीजियेगा ! लेकिन मैं महिला सशक्तिकरण में बिलीव नही करती। मैं दुर्बल, दीन, दुखी, लाचार, अबला, कमज़ोर और ऐसे ही अजीबोगरीब शब्दों से अपनी ताजपोशी नही करना चाहती।
मेरा हमेशा से मानना है !
महिलाये सक्षम थी.....है.....और रहेंगी। लेकिन लाचारी से नही बल्कि बराबरी से !

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