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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Wednesday, 27 May 2015

दिल से....!

सोचा था वक्त के साथ
तेरी फितरत भी बदल जायेगी !

रंजिशें कम होकर
तेरी नफरत में गिरावट आयेगी !

नामालूम था मुमकिन है ये
तेरी मोहब्बत भी इक रोज़ यूं बदल जायेगी !

गुनाह-ए-आशिकी में हमें
एक दिन ठोकर लग जाएगी !

इस दिल के खंडहर में
कभी मुस्कुराहट भी आयेगी !

बुझते चिरागों से जलती मोहब्बत देखकर,
क्या पता था मेरी रूह भी कांप जायेगी !

गुजर जायेगा ये ज़ालिम दौर भी कभी ना कभी
घुप्प अंधेरे के बाद नई सुबह भी आयेगी !

इश्क में ऐब है ढेरों ऐ दोस्त
नामालूम था तुझसे यूं कभी शिकायत भी आयेगी !

तेरे इश्क ने हमें बहुत कुछ दिया
कभी मगरूर, कभी बेजुबां
तो कभी वफा की काबिलियत भी सिखलायी !

दिल के मलबे को जब टटोलकर देखा
तो तेरी यादों के पिटारे से
पूरी जन्नत नजर आई !

फ्रिक न तब थी, न अब है
तू लाख सितम ढाए जा

तेरी मोहब्बत में मुझे तो बस
बरकत ही बरकत नज़र आयी !


- शिवांगी ठाकुर

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