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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Friday, 9 August 2013

Bauhara Waali...!!!

(यह पोस्ट कुछ समय पहले लिखी थी। आज अचानक डैशबोर्ड साफ़ करते हुए दिखाई दी , तो सोचा क्यूँ न पोस्ट कर दूँ, आप सभी के लिए)

एक समय था जब हर साल गाँव जाने की चेष्ठा होती थी ! पुरे साल पढाई करने के बाद एक उत्सव सा होता था गाँव जाना। एक आराम, एक सुकून, एक नयापन, एक राहत।

मुझे अच्छी तरह तो याद नहीं पर शायद मैं बारहवी कक्षा में थी, जब हमारा पूरा परिवार पिछली बार गाँव गया था ! सुबह सुबह सभी नहा धोकर तैयार हो गए थे ! बाहर टैक्सी वाले भी पूरी तैयारी में थे ! लगभग सारा सामान चढ़ चुका था, बस सवारियों के आने की बारी थी ! हम भी एक एक करके टैक्सी में बैठ गए!

और अब हम आ पहुचे थे विक्टोरिया टर्मिनस….

स्टेशन पर एक अलग प्रकार की चहल पहल थी, कही चायवाले की चाय बिक रही थी, कही एक छोटा सा लड़का हाथ में तक़रीबन आठ दस गुटखे के पैकेट लिए बेच रहा था,कही बूट - पोलिश हो रही थी, कही लोग अपने वजन की जांच कर रहे थे, कही कुछ महिलाये जो की शायाद सफाई कर्मी थी, वो स्टेशन की सफाई कर रही थी, कही कुछ लोग कुली के साथ मोल-भाव कर रहे थे, कुछ लोग सीडियों से ऊपर जा रहे तो कुछ नीचे आ रहे थे, कुछ अपने सामान की फ़िक्र में थे! और कुछ अपने बच्चो को संभाल रहे थे !

सब कुछ अच्छे तरीके से हो गया! हम सब भी अब अपनी अपनी सीट पर बैठ चुके थे ! दो दिन बाद गाँव पहुँच चुके थे ! इस बार मुझे अपनी मासी के यहाँ जाना था, वहा उनके पोते का मुंडन था बस उसी में जाना था ! बाकी लोग तो मुंडन के ठीक दो दिन पहले आने वाले थे, पर मैं और मेरी माँ वह कुछ दिन पहले ही पहुँच गए थे !

वहां सभी लोग काम में व्यस्त नज़र आ रहे थे! सभी के काम बंटे हुए थे ! मेरे लिए वो माहौल काफी अलग था, सभी लोग नए और अलग थे ! वहाँ कोई मौसी थी तो कोई दीदी ! और एक औरत जिसे मैं आज भी नहीं भूली!

उसका नाम था "बउहारा वाली"…। ऐसा अजीब नाम सुनकर मुझे भी अजीब लगा, पर माँ से पूछने पर पता चला की वो जहां से आई है उस गाँव का नाम बउहारा है इसलिए उसे बउहारा वाली कहते है ! गरीबी से बेबस और लाचार, उसकी आँखों के नीचे की झुर्रिया उसकी उम्र साफ़ बता सकती थी ! काला चेहरा और गंदे दांत ! पर मुस्कुराना मानो उसके लिए बहुत जरुरी था ….बिना किसी की फ़िक्र किये वो मुस्कुराती थी ! उस मुस्कान के पीछे कई गम थे पर वो गमो में भी हँसना जानती थी ! उससे बात करने पर पता चला की उसके पांच बच्चे है ! चार बेटियाँ और एक बेटा ! एक पति है जो की हर वक़्त शराब के नशे में डूबा हुआ यहाँ वहाँ भटकता रहता है ! वो घर घर काम करती है और अपना और अपने बच्चो का पेट पालती है ! उसे देखकर पता नहीं चलता था की वो उतनी तकलीफ से गुजर रही है ! अपनी मुस्कान के पीछे वो सबकुछ छुपा लेती थी !

काम के लिए तत्पर तैयार रहती थी ! उसे भी हमारे यहाँ बहुत अच्छा लगता था इतने सारे मेहमान ! इतनी सारी हंसी-ठिठोली ! वो ये सब देखकर ही बहुत ही खुश थी ! अब बस यही सोचती हूँ की अगली बार गाँव जाउंगी तब उसकी एक तस्वीर जरुर लेकर आउंगी ताकि आप सभी भी उसे देख सके !

तब तक एक काल्पनिक बउहारा वाली की कल्पना कीजिये !






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