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नमस्कार दोस्तों। नाम तो आपने पढ़ ही लिया होगा। बाद बाकि पेशे से टीवी पत्रकार हूं और आजतक के साथ कार्यरत हूं। लिखना पसंद है। जो समझ आता है और लिखने लायक होता है लिख देती हूं। ना तो ज्ञानी हूं और ना ज्ञान बांटने के लिए लिखती हूं। बस कुछ सच्ची और काल्पनिक कहानीयां लिखती हूं। कभी कभी फिल्म समीक्षा तो नही पर फिल्म मेरी नजर से कैसी दिखती है वो लिख देती हूं। ब्लाॅग है जहां लिखने के लिए रोक टोक नही। इसलिए बेबाक लिखती हूं ।

Saturday, 20 August 2016

सैलाब

नीरा बेदम सीधे सड़क पर चली जा रही थी। उसका शरीर पूरी तरह सुन्न पड़ गया था। स्कार्फ को कफ़न की तरह लपेटे वो बदहवास कुछ ढूंढ रही थी। हर दस कदम पर वो रुक रुक कर एक एक लाश को तलाशती। जिस रास्ते वो चल रही थी, उसके दोनों ओर लाशो का ढेर लगा हुआ था। जब भी वो किसी लाश को हाथ लगाती, तो उसे लगता कि कोई उसके दिल पर खंजर चला रहा है। उसके आंसू कुछ इस कदर बह रहे थे कि मानो आज के बाद उसके आँखों में फिर ये कभी वापस ही नहीं आएंगे। उसने कभी नहीं सोचा था कि जिस जगह वो अपने ज़िन्दगी के सबसे हसीन पल गुजारने आयी है, वही जगह उसे उसकी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा दर्द देगा। लोग नीरा को कहते थे कि शादी और सगाई के बीच का पल लड़का और लड़की के लिए बेहद खास होता है। इन पलो को यूँ जीना चाहिए कि फिर ये पल ज़िन्दगी में लौट कर ही नही आएंगे। नीरा ने भी इन बेहतरीन पलों को यादगार बनाने की ठानी और जिद करके अभिनव से उत्तराखंड चलने को कहा था। अभिनव नीरा की बात कभी नहीं टालता था। अरेंज मैरिज होने के बावजूद भी वो नीरा को किसी बेइंतेहा चाहनेवाले आशिक़ जैसा प्यार करता था। उतराखंड में तो अभी दो ही दिन बीते थे नीरा और अभिनव के। रोजाना ये दोनों यहाँ गंगोत्री जैसा गहरा प्यार और यमुनोत्री जैसी यादें बुन रहे थे। लेकिन अचानक आसमान और जमीन दोनों ने मिलकर ऐसा कहर बरपा की, नीरा अब अकेली है और उसे तो ये भी नहीं पता कि जिसके लिए वो इन आंसूओ को बहा रही है वो इंसान जिंदा भी है या नहीं। नीरा यही सब सोचते हुये फिर अपने कदम आगे बढाती उस दौर से गुजर रही थी जहाँ ना तो मौत का जिक्र था और नाही अभिनव के जिन्दा होने की कोई गुंजाईश। थक हारकर वो पास ही के एनडीआरएफ कैम्प में जा बैठी। उसने भी सोच लिया था कि या तो वो यहाँ से अभिनव को साथ लेकर लौटेगी या फिर वो खुद भी बग्याल की पहाड़ी से छलांग लगा लेगी। एनडीआरएफ कैम्प में बैठे बैठे ही वो अपनी सगाई की अंगूठी को बार बार देखती और फिर टूट जाती। नीरा अपनी ही पशोपेश में थी कि इतने में ही एनडीआरएफ के कैम्प में लगे स्पीकर में वायरलेस से एक आवाज़ आयी, "एनडीआरएफ टीम....एनडीआरएफ टीम ! वी हैव फाउंड अ मैन हू इज अलाइव ! ही हैज अ टैटू ऑन हिज हैण्ड इन्सस्क्राइब्ड विद नीरा.....ओवर एन्ड आउट !" ये शब्द सुनते ही नीरा के बेजान और सुन्न पड़े शरीर में जान आ गई और इस छोटे से अनाउंसमेंट ने नीरा की ज़िन्दगी में बड़ा सा बदलाव ला दिया।      

1 comment:

catlary shop said...

Blog is nice but should have been only in hindi or in English it becomes difficult to shift from hindi to read an English word in hindi.. Good blog keep it up